बाक़ी बची कुची है जो ताक़त लिए हुए
दर दर भटक रहा हूँ तबीयत लिए हुए
बीमार रूह और ये बोसीदा सा बदन
फिरता हूँ मुश्त ए ख़ाक अकारत लिए हुए
आता है जब वो ग़ुस्से में तो ऐसा लगता है
आया हो इश्क़ जैसे कि आफ़त लिए हुए
देखा जब उस को यूँ लगा जैसे हो आइना
आया वो मेरे सामने सूरत लिए हुए
कानों में मेरे शोर की बजती है एक गूँज
जाऊँ कहाँ अब ऐसी समा'अत लिए हुए
ज़िल्लत हुई न जिन से भी बरदाश्त तो वो फिर
महफ़िल से उठ के चल दिए इज़्ज़त लिए हुए
— Amaan mirza















