kuchh naujavaan nikal pade paidal andhere men | कुछ नौजवाँ निकल पड़े पैदल अँधेरे में

  - Amaan mirza

कुछ नौजवाँ निकल पड़े पैदल अँधेरे में
जाने किधर को जाएँगे पागल अँधेरे में

थोड़ी सी दूर चलते ही चीख़ें सुनाई दीं
अक्सर ख़मोश रहते हैं जंगल अँधेरे में

कल फिर किसी के लम्स का एहसास हो गया
कल फिर दिखाई दी मुझे हलचल अँधेरे में

मैंने जब आँखें बन्द कीं तो तू दिखा मुझे
आँखें खुलीं तो हो गया ओझल अँधेरे में

कुछ दिन के वक़्त चोट मुझे आँधियों ने दी
और उसपे फिर बरस पड़े बादल अँधेरे में

उसकी तमन्ना थी मैं किसी ग़ार में मरूँ
रहता हूँ इसलिए मैं मुसलसल अँधेरे में

हालत को मेरी देख के हैरत न कर अज़ीज़
आ मेरे साथ चार क़दम चल अँधेरे में

  - Amaan mirza

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