kisi ki ho nahin sakti hain sirf meri hain | किसी की हो नहीं सकती हैं सिर्फ़ मेरी हैं

  - Amaan mirza

किसी की हो नहीं सकती हैं सिर्फ़ मेरी हैं
ये मेरे हुजरे में तन्हाइयाँ जो फैली हैं

यहीं कहीं पे हो तुम मैं तुम्हारे पास में हूँ
हमारे दरमियाँ अब दूरियाँ ये कैसी हैं

हैं देखने को नज़ारे कई हसीन यहाँ
मगर सभी की निगाहें तुझी पे ठहरी हैं

फिर आज याद  तुम्हारी हमें रुला के गई
तुम्हारी यादें भी बिल्कुल तुम्हारे जैसी हैं

किसी नए की हो जाती हैं फिर पुराने के बाद
मोहब्बतें ये ज़माने की जाने कैसी हैं

हर एक आह को हमने छुपाए रक्खा है
ख़मोश रहते हैं लब और आँखें बहती हैं

  - Amaan mirza

Lab Shayari

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