Momin Khan Momin

Momin Khan Momin

@momin-khan-momin

Delhi· India

Momin Khan Momin shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Momin Khan Momin's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

हाथ टूटें मैं ने गर छेड़ी हों ज़ुल्फ़ें आप की आप के सर की क़सम बाद-ए-सबा थी मैं न था — Momin Khan Momin
तुम मिरे पास होते हो गोया जब कोई दूसरा नहीं होता — Momin Khan Momin
वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो कि न याद हो वही या'नी वा'दा निबाह का तुम्हें याद हो कि न याद हो — Momin Khan Momin
थी वस्ल में भी फ़िक्र-ए-जुदाई तमाम शब वो आए तो भी नींद न आई तमाम शब — Momin Khan Momin
ठानी थी दिल में अब न मिलेंगे किसी से हम पर क्या करें कि हो गए नाचार जी से हम — Momin Khan Momin

Ghazal

ग़ैरों पे खुल न जाए कहीं राज़ देखना मेरी तरफ़ भी ग़म्ज़ा-ए-ग़म्माज़ देखना उड़ते ही रंग-ए-रुख़ मिरा नज़रों से था निहाँ इस मुर्ग़-ए-पर-शिकस्ता की परवाज़ देखना दुश्नाम-ए-यार तब-ए-हज़ीं पर गिराँ नहीं ऐ हम-नफ़स नज़ाकत-ए-आवाज़ देखना देख अपना हाल-ए-ज़ार मुनज्जिम हुआ रक़ीब था साज़गार ताला-ए-ना-साज़ देखना बद-काम का मआल बुरा है जज़ा के दिन हाल-ए-सिपहर-ए-तफ़रक़ा-अंदाज़ देखना मत रखियो गर्द-ए-तारिक-ए-उश्शाक़ पर क़दम पामाल हो न जाए सर-अफ़राज़ देखना मेरी निगाह-ए-ख़ीरा दिखाते हैं ग़ैर को बे-ताक़ती पे सरज़निश-ए-नाज़ देखना तर्क-ए-सनम भी कम नहीं सोज़-ए-जहीम से 'मोमिन' ग़म-ए-मआल का आग़ाज़ देखना — Momin Khan Momin
रोया करेंगे आप भी पहरों इसी तरह अटका कहीं जो आप का दिल भी मिरी तरह आता नहीं है वो तो किसी ढब से दाव में बनती नहीं है मिलने की उस के कोई तरह तश्बीह किस से दूँ कि तरह-दार की मिरे सब से निराली वज़्अ' है सब से नई तरह मर चुक कहीं कि तू ग़म-ए-हिज्राँ से छूट जाए कहते तो हैं भले की व-लेकिन बुरी तरह ने ताब हिज्र में है न आराम वस्ल में कम-बख़्त दिल को चैन नहीं है किसी तरह लगती हैं गालियाँ भी तिरे मुँह से क्या भली क़ुर्बान तेरे फिर मुझे कह ले उसी तरह पामाल हम न होते फ़क़त जौर-ए-चर्ख़ से आई हमारी जान पे आफ़त कई तरह ने जाए वाँ बने है न बिन जाए चैन है क्या कीजिए हमें तो है मुश्किल सभी तरह मा'शूक़ और भी हैं बता दे जहान में करता है कौन ज़ुल्म किसी पर तिरी तरह हूँ जाँ-ब-लब बुतान-ए-सितमगर के हाथ से क्या सब जहाँ में जीते हैं 'मोमिन' इसी तरह — Momin Khan Momin
दिल-बस्तगी सी है किसी ज़ुल्फ़-ए-दुता के साथ पाला पड़ा है हम को ख़ुदा किस बला के साथ कब तक निभाइए बुत-ए-ना-आश्ना के साथ कीजे वफ़ा कहाँ तलक उस बे-वफ़ा के साथ याद-ए-हवा-ए-यार ने क्या क्या न गुल खिलाए आई चमन से निकहत-ए-गुल जब सबा के साथ माँगा करेंगे अब से दुआ हिज्र-ए-यार की आख़िर तो दुश्मनी है असर को दुआ के साथ है किस का इंतिज़ार कि ख़्वाब-ए-अदम से भी हर बार चौंक पड़ते हैं आवाज़-ए-पा के साथ या रब विसाल-ए-यार में क्यूँँकर हो ज़िंदगी निकली ही जान जाती है हर हर अदा के साथ अल्लाह रे सोज़-ए-आतिश-ए-ग़म बा'द-ए-मर्ग भी उठते हैं मेरी ख़ाक से शो'ले हवा के साथ सौ ज़िंदगी निसार करूँँ ऐसी मौत पर यूँँ रोए ज़ार ज़ार तू अहल-ए-अज़ा के साथ हर दम अरक़ अरक़ निगह-ए-बे-हिजाब है किस ने निगाह-ए-गर्म से देखा हया के साथ मरने के बा'द भी वही आवारगी रही अफ़्सोस जाँ गई नफ़स-ए-ना-रसा के साथ दस्त-ए-जुनूँ ने मेरा गरेबाँ समझ लिया उलझा है उन से शोख़ के बंद-ए-क़बा के साथ आते ही तेरे चल दिए सब वर्ना यास का कैसा हुजूम था दिल-ए-हसरत-फ़ज़ा के साथ मैं कीने से भी ख़ुश हूँ कि सब ये तो कहते हैं उस फ़ित्ना-गर को लाग है इस मुब्तला के साथ अल्लाह री गुमरही बुत ओ बुत-ख़ाना छोड़ कर 'मोमिन' चला है का'बा को इक पारसा के साथ 'मोमिन' वही ग़ज़ल पढ़ो शब जिस से बज़्म में आती थी लब पे जान ज़ह-ओ-हब्बज़ा के साथ — Momin Khan Momin
ठानी थी दिल में अब न मिलेंगे किसी से हम पर क्या करें कि हो गए नाचार जी से हम हंसते जो देखते हैं किसी को किसी से हम मुँह देख देख रोते हैं किस बेकसी से हम हम से न बोलो तुम इसे क्या कहते हैं भला इंसाफ़ कीजे पूछते हैं आप ही से हम बे-ज़ार जान से जो न होते तो माँगते शाहिद शिकायतों पे तिरी मुद्दई से हम उस कू में जा मरेंगे मदद ऐ हुजूम-ए-शौक़ आज और ज़ोर करते हैं बे-ताक़ती से हम साहब ने इस ग़ुलाम को आज़ाद कर दिया लो बंदगी कि छूट गए बंदगी से हम इन ना-तावनियों पे भी थे ख़ार-ए-राह-ए-ग़ैर क्यूँँंकर निकाले जाते न उस की गली से हम मुँह देखने से पहले भी किस दिन वो साफ़ था बे-वजह क्यूँ ग़ुबार रखें आरसी से हम है छेड़ इख़्तिलात भी ग़ैरों के सामने हँसने के बदले रोएँ न क्यूँ गुदगुदी से हम वहशत है इश्क़-ए-पर्दा-नशीं में दम-ए-बुका मुँह ढांकते हैं पर्दा-ए-चश्म-ए-परी से हम क्या दिल को ले गया कोई बेगाना-आश्ना क्यूँँ अपने जी को लगते हैं कुछ अजनबी से हम ले नाम आरज़ू का तो दिल को निकाल लें 'मोमिन' न हों जो रब्त रखें बिदअती से हम — Momin Khan Momin