thaanii thii dil men ab na milenge kisi se ham | ठानी थी दिल में अब न मिलेंगे किसी से हम

  - Momin Khan Momin

ठानी थी दिल में अब न मिलेंगे किसी से हम
पर क्या करें कि हो गए नाचार जी से हम

हंसते जो देखते हैं किसी को किसी से हम
मुँह देख देख रोते हैं किस बेकसी से हम

हम से न बोलो तुम इसे क्या कहते हैं भला
इंसाफ़ कीजे पूछते हैं आप ही से हम

बे-ज़ार जान से जो न होते तो मांगते
शाहिद शिकायतों पे तिरी मुद्दई से हम

उस कू में जा मरेंगे मदद ऐ हुजूम-ए-शौक़
आज और ज़ोर करते हैं बे-ताक़ती से हम

साहब ने इस ग़ुलाम को आज़ाद कर दिया
लो बंदगी कि छूट गए बंदगी से हम

इन ना-तावनियों पे भी थे ख़ार-ए-राह-ए-ग़ैर
क्यूँँंकर निकाले जाते न उस की गली से हम

मुँह देखने से पहले भी किस दिन वो साफ़ था
बे-वजह क्यूँँं ग़ुबार रखें आरसी से हम

है छेड़ इख़्तिलात भी ग़ैरों के सामने
हँसने के बदले रोएँ न क्यूँँं गुदगुदी से हम

वहशत है इश्क़-ए-पर्दा-नशीं में दम-ए-बुका
मुँह ढांकते हैं पर्दा-ए-चश्म-ए-परी से हम

क्या दिल को ले गया कोई बेगाना-आश्ना
क्यूँँ अपने जी को लगते हैं कुछ अजनबी से हम

ले नाम आरज़ू का तो दिल को निकाल लें
'मोमिन' न हों जो रब्त रखें बिदअती से हम

  - Momin Khan Momin

Charity Shayari

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