Shuja Khawar

Shuja Khawar

@shuja-khawar

Shuja Khawar shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Shuja Khavvar's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

हज़ार रंग में मुमकिन है दर्द का इज़हार तिरे फ़िराक़ में मरना ही क्या ज़रूरी है — Shuja Khawar
दिल में नफ़रत हो तो चेहरे पे भी ले आता हूँ बस इसी बात से दुश्मन मुझे पहचान गए — Shuja Khawar
दिल की बातें दूसरों से मत कहो लुट जाओगे आज कल इज़हार के धंधे में है घाटा बहुत — Shuja Khawar
चारागरी की बात किसी और से करो अब हो गए हैं यारो पुराने मरीज़ हम — Shuja Khawar
सरसरी अंदाज़ से देखोगे तो महफ़िल ही महफ़िल ग़ौर से देखोगे तो हर आदमी तन्हा लगेगा — Shuja Khawar
मेरे हालात को बस यूँँ समझ लो परिंदे पर शजर रक्खा हुआ है — Shuja Khawar
बे-आरज़ू भी ख़ुश हैं ज़माने में बाज़ लोग याँ आरज़ू के साथ भी जीना हराम है — Shuja Khawar
ख़ुदा ने चाहा तो सब इंतिज़ाम कर देंगे ग़ज़ल पे आए तो मतले में काम कर देंगे — Shuja Khawar
या तो जो ना-फ़हम हैं वो बोलते हैं इन दिनों या जिन्हें ख़ामोश रहने की सज़ा मालूम है — Shuja Khawar

Ghazal

यहाँ तो क़ाफ़िले भर को अकेला छोड़ देते हैं सभी चलते हों जिस पर हम वो रस्ता छोड़ देते हैं क़लम में ज़ोर जितना है जुदाई की बदौलत है मिलन के बा'द लिखने वाले लिखना छोड़ देते हैं कभी सैराब कर जाता है हम को अब्र का मंज़र कभी सावन बरस कर भी पियासा छोड़ देते हैं ज़मीं के मसअलों का हल अगर यूँँ ही निकलता है तो लो जी आज से हम तुम से मिलना छोड़ देते हैं मोहज़्ज़ब दोस्त आख़िर हम से बरहम क्यूँँ नहीं होंगे सग-ए-इज़हार को हम भी तो खुल्ला छोड़ देते हैं जो ज़िंदा हो उसे तो मार देते हैं जहाँ वाले जो मरना चाहता हो उस को ज़िंदा छोड़ देते हैं मुकम्मल ख़ुद तो हो जाते हैं सब किरदार आख़िर में मगर कम-बख़्त क़ारी को अधूरा छोड़ देते हैं वो नंग-ए-आदमियत ही सही पर ये बता ऐ दिल पुराने दोस्तों को इस तरह क्या छोड़ देते हैं ये दुनिया-दारी और इरफ़ान का दावा 'शुजा-ख़ावर' मियाँ इरफ़ान हो जाए तो दुनिया छोड़ देते हैं — Shuja Khawar
उस को न ख़याल आए तो हम मुँह से कहें क्या वो भी तो मिले हम से हमीं उस से मिलें क्या लश्कर को बचाएँगी ये दो-चार सफ़ें क्या और उन में भी हर शख़्स ये कहता है हमें क्या ये तो सभी कहते हैं कोई फ़िक्र न करना ये कोई बताता नहीं हम को कि करें क्या घर से तो चले आते हैं बाज़ार की जानिब बाज़ार में ये सोचते फिरते हैं कि लें क्या आँखों को किए बंद पड़े रहते हैं हम लोग इस पर भी तो ख़्वाबों से हैं महरूम करें क्या दो चार नहीं सैंकड़ों शे'र उस पे कहे हैं इस पर भी वो समझे न तो क़दमों पे झुकें क्या जिस्मानी तअल्लुक़ पे ये शर्मिंदगी कैसी आपस में बदन कुछ भी करें इस से हमें क्या ख़्वाबों से भी मिलते नहीं हालात के डर से माथे से बड़ी हो गईं यारो शिकनें क्या — Shuja Khawar