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मेरे हालात को बस यूँ समझ लो
परिंदे पर शजर रक्खा हुआ है
परिंदे पर शजर रक्खा हुआ है
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दिल की बातें दूसरों से मत कहो लुट जाओगे
आज कल इज़हार के धंधे में है घाटा बहुत
आज कल इज़हार के धंधे में है घाटा बहुत
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उस को न ख़याल आए तो हम मुँह से कहें क्या
वो भी तो मिले हम से हमीं उस से मिलें क्या
वो भी तो मिले हम से हमीं उस से मिलें क्या
लश्कर को बचाएँगी ये दो-चार सफ़ें क्या
और उन में भी हर शख़्स ये कहता है हमें क्या
ये तो सभी कहते हैं कोई फ़िक्र न करना
ये कोई बताता नहीं हम को कि करें क्या
घर से तो चले आते हैं बाज़ार की जानिब
बाज़ार में ये सोचते फिरते हैं कि लें क्या
आँखों को किए बंद पड़े रहते हैं हम लोग
इस पर भी तो ख़्वाबों से हैं महरूम करें क्या
दो चार नहीं सैंकड़ों शे'र उस पे कहे हैं
इस पर भी वो समझे न तो क़दमों पे झुकें क्या
जिस्मानी तअल्लुक़ पे ये शर्मिंदगी कैसी
आपस में बदन कुछ भी करें इस से हमें क्या
ख़्वाबों से भी मिलते नहीं हालात के डर से
माथे से बड़ी हो गईं यारो शिकनें क्या
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ख़ुदा ने चाहा तो सब इंतिज़ाम कर देंगे
ग़ज़ल पे आए तो मतले में काम कर देंगे
ग़ज़ल पे आए तो मतले में काम कर देंगे
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चारागरी की बात किसी और से करो
अब हो गए हैं यारो पुराने मरीज़ हम
अब हो गए हैं यारो पुराने मरीज़ हम
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या तो जो ना-फ़हम हैं वो बोलते हैं इन दिनों
या जिन्हें ख़ामोश रहने की सज़ा मालूम है
या जिन्हें ख़ामोश रहने की सज़ा मालूम है
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दूसरी बातों में हम को हो गया घाटा बहुत
वर्ना फ़िक्र-ए-शेर को दो वक़्त का आटा बहुत
वर्ना फ़िक्र-ए-शेर को दो वक़्त का आटा बहुत
काएनात और ज़ात में कुछ चल रही है आज कल
जब से अंदर शोर है बाहर है सन्नाटा बहुत
आरज़ू का शोर बरपा हिज्र की रातों में था
वस्ल की शब तो हुआ जाता है सन्नाटा बहुत
हम से तो इक शे'र सुन कर फ़लसफ़ी चुप हो गया
लेकिन उस ने बे-ज़बाँ नक़्क़ाद को चाटा बहुत
दिल की बातें दूसरों से मत कहो लुट जाओगे
आज कल इज़हार के धंधे में है घाटा बहुत
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