आँख में जलते हुए ख़्वाब की ता'बीर बनूँ

बन नहीं सकता मगर चाहता हूँ नीर बनूँ

बा'द मरने के मैं शैतान कहा जाऊँगा
हाँ मगर मेरी भी ख़्वाहिश नहीं मैं पीर बनूँ

दिल से आसाँ है क़बीलों पे फतह करना सनम
इस लिए मैं ने भी सोचा है जहाँगीर बनूँ

किस तरह दूँ मैं तुम्हें अपनी वफाओं का सुबूत
किस तरह दोस्त मुहब्बत में मैं तनवीर बनूँ

तेरे हाथों की लकीरों से निकाला गया हूँ
जाने अब किस के मुक़द्दर की मैं तक़दीर बनूँ

ये कहानी मैं ज़ुबानी सुना सकता हूँ मगर
तुम अगर देखना चाहो तो मैं तस्वीर बनूँ

काम मुश्किल है बहुत अच्छा सुख़न-वर होना
ठीक तो ये है मैं मिर्ज़ा रहूँ क्यूँ मीर बनूँ

— Amaan mirza

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