"आज कल"
मैं रोज़ जब घर से निकलता हूँ
तो मैं ये सोचता हूँ
आज इस मुश्क़िल घड़ी का आख़िरी दिन हो
मगर ऐसा नहीं होता
कभी तो कुछ हो जाता है कभी सब कुछ खो जाता है
मिलेगा जाने कब इन मसअलों का हल
बहुत बेचैन हूँ मैं आज कल
— Amaan mirza
मैं रोज़ जब घर से निकलता हूँ
तो मैं ये सोचता हूँ
आज इस मुश्क़िल घड़ी का आख़िरी दिन हो
मगर ऐसा नहीं होता
कभी तो कुछ हो जाता है कभी सब कुछ खो जाता है
मिलेगा जाने कब इन मसअलों का हल
बहुत बेचैन हूँ मैं आज कल
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