जैसे कि दिन अलग है ये और रात मुख़्तलिफ़
बस ऐसे ही है आप की हर बात मुख़्तलिफ़
घर एक दश्त है जहाँ हैं ग़म की बारिशें
हर रोज़ होती है यहाँ बरसात मुख़्तलिफ़
आदम के बच्चे हैं सभी बन्दे ख़ुदा के हैं
फिर भी हमारी हो गई है ज़ात मुख़्तलिफ़
इक जैसी हैं हमारी परेशानियाँ मगर
हर बार होते हैं मेरे हालात मुख़्तलिफ़
मुझ को ख़रीद सकते हैं बस ऐसे लोग जो
मायार ऊँचा रखते हों औक़ात मुख़्तलिफ़
— Amaan mirza















