मुझ सेे अंजान था फिर भी वो मेरा ख़ास हुआ

जाने अनजाने में ये दिल बड़ा हस्सास हुआ

पहले तन्हाई में ख़ामोशी की आहट हुई और
फिर अचानक किसी के लम्स का एहसास हुआ

ढूँढ़ने लग गया मैं तब से तअल्लुक़ के जवाज़
जब मुझे तर्क ए तअल्लुक़ का ज़रा यास हुआ

यारों उस कै़स की मानिंद रहा मेरा नसीब
वस्ल में फेल हुआ हिज्र में मैं पास हुआ

ज़िंदगी ऐसे पलटती रही मेरे दिन-ओ-रात
मानो जैसे किसी बुक का कोई क़िर्तास हुआ

— Amaan mirza

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Ehsaas Shayari

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