kuchh itnaa khaas nahin par talash kar rahi hai | कुछ इतना ख़ास नहीं पर तलाश कर रही है

  - Amaan mirza

कुछ इतना ख़ास नहीं पर तलाश कर रही है
ये आँख कौन सा मंज़र तलाश कर रही है

यहाँ बग़ैर सुबूतों के मिलता नइँ इंसाफ
सो लाश ख़ुद में ही ख़ंजर तलाश कर रही है

मशक्क़तों से परेशानियों से तंग आकर
थकान रस्तों पे बिस्तर तलाश कर रही है

हमें सुकूँ के सिवा इस सुख़न ने कुछ न दिया
मगर ये नस्ल यहाँ ज़र तलाश कर रही है

और उसको दे दिया मैंने तुम्हारे घर का पता
फ़लाँ की लड़की है वो वर तलाश कर रही है

वो उठ के क्या गए महफ़िल से रौनक़ें भी गईं
उदासी चार सू अब घर तलाश कर रही है

जहाज़ उड़ा रहे है बेटे और इक बेटी
उड़ान भरने को अंबर तलाश कर रही है

भटक रही है जो सहरा में कै़स की मानिंद
ये रूह प्यासी है दिलबर तलाश कर रही है

सभी ने अपने लिए इसका इस्तेमाल किया
हुक़ूमत अब नया दावर तलाश कर रही है

अज़ीज़ मेरा भी दम घुट रहा है मलबे में
के रूह अब नया पैकर तलाश कर रही है

मज़े मज़े में मेरे हाथ लग गई शमशीर
गुनाहगारों का जो सर तलाश कर रही है

  - Amaan mirza

Aankhein Shayari

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