Sandeep dabral 'sendy'

Sandeep dabral 'sendy'

@sandeepdabral

Sandeep dabral 'sendy' shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Sandeep dabral 'sendy''s shayari and don't forget to save your favorite ones.

Followers

9

Content

379

Likes

202

Shayari
Audios
  • Sher
  • Ghazal
  • Nazm

Sher

नामुमकिन जैसा तो कुछ भी नहीं है दुनिया में पत्थर को भी काटा जा सकता है पानी से — Sandeep dabral 'sendy'
क़त्ल अदाएँ और निगाहें करती हैं इश्क़ में मुल्ज़िम दिल बेचारा होता है — Sandeep dabral 'sendy'
सबकी ज़बाँ पे सब सेे प्यारा होता है अच्छा शे'र यहाँ आवारा होता है — Sandeep dabral 'sendy'
कुछ और लौटाओ या मत लौटाओ लेकिन हे ख़ालिक़ बस विधवा के पैरों में पायल की छन छन लौटा दो — Sandeep dabral 'sendy'
मरने से पहले यहाँ जीते जी मरना पड़ता है सो इतना आसाँ है कहाँ ये ख़ुद-कुशी की मौत मरना — Sandeep dabral 'sendy'
ये मानो न मानो यहाँ अपना कल सुन रहा है ये पढ़ने की इस उम्र में जो ग़ज़ल सुन रहा है — Sandeep dabral 'sendy'
चूड़ियों का नाप लेने आया था मैं उस की सम्त देख कर हाथों में कंगन मैं पलट कर आ गया — Sandeep dabral 'sendy'
जिस ने नज़राने में इक रोज़ ये घड़ी थी दी आज उसी के पास हमारे लिए समय नइँ है — Sandeep dabral 'sendy'
इश्क़ ने बर्बाद ऐसे की यहाँ फ़स्लें हमारी सो भरी हैं अब उदासी से नई नस्लें हमारी — Sandeep dabral 'sendy'
हम तो सिर्फ़ तुम्हारी दु'आओं से ठीक होने वाले हैं इलाज गर कुछ मुमकिन होता तो फिर चारा-गर करते — Sandeep dabral 'sendy'
लोग पता पूछा करते हैं तुम्हारा और सबका मेरी ओर इशारा होता है — Sandeep dabral 'sendy'
जीतने की नज़ीर पेश करो खेल में अब वज़ीर पेश करो — Sandeep dabral 'sendy'
गर इक बार मुयस्सर ये गाल हो जाएँ हम भी गुलाल के हम-ख़याल हो जाएँ — Sandeep dabral 'sendy'
इस लिए ईद का करता हूँ इंतिज़ार ताकि अपने पिता के गले लग सकूँ — Sandeep dabral 'sendy'
एक कहानी और बयाँ कर रहे कटे पर दुनिया की पक्का आज किसी ने फिर उड़ने की कोशिश की होगी — Sandeep dabral 'sendy'
वो तो मैं हूँ जो अब तक ठीक-ठाक हूँ वरना ये इतने ग़म और किसी को पागल कर देते — Sandeep dabral 'sendy'
कि वर्षों बा'द वो अब अपने धाम आ रहे हैं अवध पुरी में मेरे प्रभु श्री राम आ रहे हैं — Sandeep dabral 'sendy'

Ghazal

हज़ारों इश्क़ की कहानियाँ यों ही सिमट गईं न जाने कितने ही करों की याँ नसें भी कट गईं कहीं हज़ारों चिट्ठियों से कुछ नहीं हुआ है तो कहीं कुछेक उल्टियों से बाजियाँ पलट गईं वो एक शख़्स अपने साथ रौनक़ें भी ले गया लबों पे ख़ामुशी गले उदासियाँ लिपट गईं क़रीब आने से मिज़ाज सबका ही बदल गया घरों से याँ अमीरों की हवेलियाँ जो सट गईं कहा कि नेटवर्क मसअला है बात कटने का कि घंटों होने वाली बातें मिनटों में निपट गईं असर भी हिज्र का हुआ है तो हुआ है इस तरह कभी न पटने वाली याँ ख़मोशियाँ भी पट गईं निकालने से भी नहीं निकाली जा रही हैं अब कि यादें ज़ेहन में हमारे जोंकों सी चिपट गईं — Sandeep dabral 'sendy'
ऊला दिन खाए तो याँ रात कटे सानी में ग़ज़लें मिलती कहाँ हैं इतनी भी आसानी में वक़्त लगता है नतीजों को निकलने में सो अक्स दिखता न कभी चलते हुए पानी में जितने किरदार थे, थे यार बहुत पेचीदा सो समझ आई कहानी नज़र-ए-सानी में वीडियो गेम के शौकीन हुए जब से हम अब मज़ा आता नहीं बच्चों की शैतानी में हाथ से बच्चे निकल जाते हैं याँ पल भर में गर ज़रा सी कमी रह जाए निगहबानी में बच्चे तो बच्चे हैं बच्चों की कहें ही क्या, वो शे'र के दाँत भी गिन लेते हैं नादानी में दौर वो बीत गया जिस में वसन भाता था अब मज़ा आता फ़क़त लोगों को उर्यानी में भाव को शब्दों में हम ढालते हैं और कुछ नइँ ऐसे मत देखा करो याँ हमें हैरानी में — Sandeep dabral 'sendy'
तिफ़्ल थे जब हम हमारे दिल पे इतने पर्दे नइँ थे याँ सभी कुछ था मगर चेहरे पे इतने चेहरे नइँ थे नौकरी से पहले बिल्कुल मामला था याँ बराबर वो भी इतने महँगे नइँ थे हम भी इतने सस्ते नहँ थे तान के सीना चला करते थे हम भी याँ सर-ए-रह काँधे ज़िम्मेदारियों के जब हमारे बस्ते नइँ थे हम कहीं भी आया जाया करते थे बे-फ़िक्र हो के कमसिनी के वक़्त तो नज़रों के इतने पहरे नइँ थे आज छोटी-छोटी बातों से आ जाती हैं दरारें बालपन में दोस्ती के रस्ते इतने कच्चे नइँ थे रंज है बेहद किसी ने थोड़ी कोशिश भी नहीं की ज़ख़्म हल्के-हल्के ही थे सारे इतने गहरे नइँ थे हम बड़ी संजीदगी से पेश आते थे सभी को हिज्र में पागल हुए हैं क़ब्ल ऐसे हँसते नइँ थे — Sandeep dabral 'sendy'
आजकल मैं इक कहानी लिख रहा हूँ उस में बस दुनिया सयानी लिख रहा हूँ है जिन्हें याँ देख कर गिरगिट भी हैरान उन को भी मैं ख़ानदानी लिख रहा हूँ जाने क्या-क्या लिख रहे हैं लोग लेकिन मैं तो पानी को ही पानी लिख रहा हूँ जान लेने पर तुले हैं लोग सबकी जान कैसे है बचानी लिख रहा हूँ हैं बुझाने में लगे सब जन दिए को कैसे बाती है बढ़ानी लिख रहा हूँ सब लगाने के तरीक़े हैं सिखाते आग कैसे है बुझानी लिख रहा हूँ और क्या ही लिखना है कोई बताए साँस को माँ का मआ'नी लिख रहा हूँ कनखियों से झाँकने की बात और है बज़्म में नज़रें चुरानी लिख रहा हूँ हाथों से तो सब पिलाते हैं मगर मैं मद्य आँखों से पिलानी लिख रहा हूँ लोग पल पल लिख रहे हैं मौत और मैं हर समय बस ज़िंदगानी लिख रहा हूँ सब गिराने में लगे दस्तार को याँ कैसे इज़्ज़त है कमानी लिख रहा हूँ लिखने के क़ाबिल हैं तालीमात सारी कुछ नई और कुछ पुरानी लिख रहा हूँ — Sandeep dabral 'sendy'
जितना वश में है यहाँ तुम्हारे उतना ही कहो मैं ने कब कहा तुम्हें कि मुझ को ज़िंदगी कहो बैठ कर हमेशा रहना है तुम्हारी आँखों में चाहे रौशनी कहो मुझे या किरकिरी कहो एक रोज़ मिलना तय है याँ नदी का जलधि से सो मुझे पयोधि और ख़ुद को तुम नदी कहो दूर से ही खींच लाती ख़ुशबू पास अपने याँ मुझ को भृंग और अपने आप को कली कहो मैं बिछा के आँखें कब से बैठा इंतिज़ार में चाहे इस को बंदगी कहो या आशिक़ी कहो देती है मिसाल जिन के रब्त की ये दुनिया याँ मुझ को नीर और ख़ुद को तीव्र तिश्नगी कहो तुम रक़ीब मत कहो मुझे यहाँ किसी का भी इल्तिजा है इतनी सिर्फ़ अपना आदमी कहो — Sandeep dabral 'sendy'
ज़ख़्मी वीरों को याँ घाइल समझा जाता है सारे सुख़न-वरो को पागल समझा जाता है वो केवल पायल नइँ हैं बेड़ियाँ भी याँ जिन को दुनिया की नज़रों में पायल समझा जाता है इक बूँद ही बहुत होती है प्यासे के ख़ातिर सहरा में कथरी को जंगल समझा जाता है है शिक्षा का बहुत ज़रूरी क़िरदार ज़ीस्त में वर्ना दुख़ान को भी बादल समझा जाता है सूरत कहाँ यहाँ कान तक न देखे हैं उस के जिस के कानों का याँ कुंडल समझा जाता है क़ीमत अगर पता होती तो बहने नइँ देते पर अश्कों को मामूली जल समझा जाता है न आज तक आया है न वो कभी याँ आएगा जिस को सबकी भाषा में कल समझा जाता है — Sandeep dabral 'sendy'
एक रोज़ हम भी याँ कुछ कमाल लिक्खेंगे क़ब्ल क़ब्ल उलफ़त की जब मिसाल लिक्खेंगे इक तरफ़ लिखेंगे हम ख़ूबसूरती जग की इक तरफ़ तुम्हारे लब और गाल लिक्खेंगे एक झटके में जिस में सब ही कुछ समा जाए आँखों को तुम्हारी हम भीमताल लिक्खेंगे वक़्त को भी लिक्खेंगे हम हिसाब से अपने हिज्र के दिनों को हम सालों साल लिक्खेंगे लोग लिखते हैं अक्सर दूरी दरमियाँ सबके दरमियाँ धरा नभ के हम विसाल लिक्खेंगे जिस को देख तम का मुख पीला पड़ने लग जाए हम तुम्हारे चेहरे को याँ उजाल लिक्खेंगे लब ख़मोश रहते हैं आँखें बात करती हैं इश्क़ का अनोखा याँ ये मक़ाल लिक्खेंगे सोचते ही होंठों पर इबतिसाम छा जाए तुम को हम यहाँ ऐसा इक ख़याल लिक्खेंगे — Sandeep dabral 'sendy'

Nazm

"मैं देखता हूँ" ख़ुद को खोने का उस की आँखों में डर देखता हूँ उस के दिल में ख़ुद के लिए मैं एक घर देखता हूँ कैसे कह दूँ मैं कि लोग यहाँ यादों में मार देते हैं पर उस की यादों में ख़ुद को मैं अमर देखता हूँ डूब जाता हूँ अक्सर उस की झील सी आँखों में निगाहों को जब मैं फ़क़त नज़र भर देखता हूँ यादों का क़ाफ़िला करता है जब भी मुझे परेशाँ फ़लक में अपलक नीमशब मैं क़मर देखता हूँ देता हूँ तवज्जोह सदा सूरत के ऊपर सीरत को हर चीज़ में सीरत मैं शाम-ओ-सहर देखता हूँ होते अक्सर ख़िज़ाँ में बेरूखे शजर-ए-निस्बत ख़िज़ाँ में भी वो लहलहाता है शजर देखता हूँ सोच नज़रिया बर्ताव दुनिया से ख़ास है उस का ख़ुद पर उस की सादगी का मैं असर देखता हूँ सादगी उस की क़ल्ब में कुछ ऐसा घर कर गई कि ख़्वाबों ख़्यालों में पहर-दर-पहर देखता हूँ उस की नेकदिली की अब क्या मिसाल दूँ आप को बाग़ में न उस सेे हसीन मैं गुल-ए-तर देखता हूँ — Sandeep dabral 'sendy'
'प्रेम लिखने लगा हूँ' सुनो मालूम है क्या तुम्हें? मैं आज-कल प्रेम लिखने लगा हूँ और प्रेम में तुम्हें लिखने लगा हूँ लिखता हूँ पेशानी पर सुशोभित छोटी सी बिंदी काली गुलाबी लब औ' सुकुमार रुख़सारों की लाली तुम्हारे खुले हुए गेसू और उस में उलझी बाली। तो कभी लिखता हूँ नाज़ुक पाँव में बँधे नूपुरों की झंकार सुरमई अँखियों से बहते यादों में अश्क ज़ार-ज़ार मेरी ज़रा सी ग़लती पर आँखें तरेरना छोटी-छोटी बातों पर अबोध बालक के मानिंद रूठ कर मुँह फुलाना लिखता हूँ मनाने के लिए जबीं पर एक बोसा चाहना महफ़िल में नज़रों से नज़रें मिलाना शरमा के पलभर में पलकें गिराना शीतलता से ओतप्रोत निशा में गोद में सर रख के फ़लक को अपलक निहारना टूटते तारों से दु'आओं में हमें माँगना कभी शूल सी चुभती तुम्हारी ख़ामोशी तो कभी गर्मजोशी लिखता हूँ अदाएँ हैं तुम्हारी सब निराली मैं पतझड़ में हरियाली लिखता हूँ कभी तुम्हारी नादानी तो कभी समझदारी लिखता हूँ कभी आँखों का पानी कभी मुस्कान प्यारी लिखता हूँ कभी मिलन की शीतल छाँव तो कभी वियोग की धूप लिखता हूँ आज-कल मैं प्रेम का ज़रा ज़रा सा हर एक रूप लिखता हूँ कभी तुम्हें दूर तो कभी अपने पास लिखता हूँ तुम्हारे साथ बिताए हर एक लम्हें को मैं ख़ास लिखता हूँ तुम सेे और तुम्हारी सादगी से मैं बहुत कुछ सीखने लगा हूँ मैं आज-कल प्रेम लिखने लगा हूँ और प्रेम में तुम्हें लिखने लगा हूँ, है ये ख़ूब-सूरत एहसास और आज-कल इसे जीने लगा हूँ‌ — Sandeep dabral 'sendy'