ऊला दिन खाए तो याँ रात कटे सानी में
ग़ज़लें मिलती कहाँ हैं इतनी भी आसानी में
वक़्त लगता है नतीजों को निकलने में सो
अक्स दिखता न कभी चलते हुए पानी में
जितने किरदार थे, थे यार बहुत पेचीदा
सो समझ आई कहानी नज़र-ए-सानी में
वीडियो गेम के शौकीन हुए जब से हम
अब मज़ा आता नहीं बच्चों की शैतानी में
हाथ से बच्चे निकल जाते हैं याँ पल भर में
गर ज़रा सी कमी रह जाए निगहबानी में
बच्चे तो बच्चे हैं बच्चों की कहें ही क्या, वो
शेर के दाँत भी गिन लेते हैं नादानी में
दौर वो बीत गया जिसमें वसन भाता था
अब मज़ा आता फ़क़त लोगों को उर्यानी में
भाव को शब्दों में हम ढालते हैं और कुछ नइँ
ऐसे मत देखा करो याँ हमें हैरानी में
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