'प्रेम लिखने लगा हूँ'
सुनो
मालूम है क्या तुम्हें?
मैं आज-कल
प्रेम लिखने लगा हूँ
और प्रेम में तुम्हें लिखने लगा हूँ
लिखता हूँ
पेशानी पर सुशोभित
छोटी सी बिंदी काली
गुलाबी लब औ' सुकुमार
रुख़सारों की लाली
तुम्हारे खुले हुए गेसू
और उस
में उलझी बाली।
तो कभी
लिखता हूँ
नाज़ुक पाँव में
बँधे नूपुरों की झंकार
सुरमई अँखियों से बहते
यादों में अश्क ज़ार-ज़ार
मेरी ज़रा सी
ग़लती पर आँखें तरेरना
छोटी-छोटी बातों पर
अबोध बालक के मानिंद
रूठ कर मुँह फुलाना
लिखता हूँ
मनाने के लिए
जबीं पर एक बोसा चाहना
महफ़िल में
नज़रों से नज़रें मिलाना
शरमा के
पलभर में पलकें गिराना
शीतलता से
ओतप्रोत निशा में
गोद में सर रख के
फ़लक को अपलक निहारना
टूटते तारों से
दु'आओं में हमें माँगना
कभी
शूल सी चुभती
तुम्हारी ख़ामोशी
तो कभी गर्मजोशी लिखता हूँ
अदाएँ हैं
तुम्हारी सब निराली
मैं पतझड़ में हरियाली लिखता हूँ
कभी
तुम्हारी नादानी
तो कभी समझदारी लिखता हूँ
कभी आँखों का पानी
कभी मुस्कान प्यारी लिखता हूँ
कभी
मिलन की शीतल छाँव
तो कभी
वियोग की धूप लिखता हूँ
आज-कल मैं प्रेम का
ज़रा ज़रा सा हर एक रूप लिखता हूँ
कभी तुम्हें दूर तो
कभी अपने पास लिखता हूँ
तुम्हारे साथ बिताए हर एक
लम्हें को मैं ख़ास लिखता हूँ
तुम से और
तुम्हारी सादगी से
मैं बहुत कुछ सीखने लगा हूँ
मैं आज-कल
प्रेम लिखने लगा हूँ
और प्रेम में तुम्हें लिखने लगा हूँ,
है ये ख़ूब-सूरत एहसास
और आज-कल इसे जीने लगा हूँ















