जितना वश में है यहाँ तुम्हारे उतना ही कहो

मैं ने कब कहा तुम्हें कि मुझ को ज़िंदगी कहो

बैठ कर हमेशा रहना है तुम्हारी आँखों में
चाहे रौशनी कहो मुझे या किरकिरी कहो

एक रोज़ मिलना तय है याँ नदी का जलधि से
सो मुझे पयोधि और ख़ुद को तुम नदी कहो

दूर से ही खींच लाती ख़ुशबू पास अपने याँ
मुझ को भृंग और अपने आप को कली कहो

मैं बिछा के आँखें कब से बैठा इंतिज़ार में
चाहे इस को बंदगी कहो या आशिक़ी कहो

देती है मिसाल जिन के रब्त की ये दुनिया याँ
मुझ को नीर और ख़ुद को तीव्र तिश्नगी कहो

तुम रक़ीब मत कहो मुझे यहाँ किसी का भी
इल्तिजा है इतनी सिर्फ़ अपना आदमी कहो

— Sandeep dabral 'sendy'

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