Shahid Zaki

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Shahid Zaki shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Shahid Zaqi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

मैं बिखर गया तो सँवर गया मेरे मुंसिफ़ो को ये दुख रहा वही फ़ैसला मेरे हक़ में था जो मेरे ख़िलाफ़ किया गया — Shahid Zaki
मिरे गुनाह की मुझ को सज़ा नहीं देता मिरा ख़ुदा कहीं नाराज़ तो नहीं मुझ से — Shahid Zaki
वो ना-समझ मुझे पत्थर समझ के छोड़ गया वो चाहता तो सितारे तराशता मुझ से — Shahid Zaki
किसी ने कहा था टूटी हुई नाव में चलो दरिया के साथ आप की रंजिश फ़ुज़ूल है — Shahid Zaki
ऐसा बदला हूँ तिरे शहर का पानी पी कर झूट बोलूँ तो नदामत नहीं होती मुझ को — Shahid Zaki
मैं आप अपनी मौत की तय्यारियों में हूँ मेरे ख़िलाफ़ आप की साज़िश फ़ुज़ूल है — Shahid Zaki
लाशों में एक लाश मिरी भी न हो कहीं तकता हूँ एक एक को चादर उठा के मैं — Shahid Zaki
यार भी राह की दीवार समझते हैं मुझे मैं समझता था मेरे यार समझते हैं मुझे — Shahid Zaki
ये मुझे नींद में चलने की जो बीमारी है मुझ को इक ख़्वाब-सरा अपनी तरफ़ खींचती है — Shahid Zaki
उस एक ख़त ने सुख़न-वर बना दिया मुझ को वो एक ख़त कि जो लिक्खा नहीं गया मुझ से — Shahid Zaki
ऐ आसमान तेरी इनायत बजा मगर फ़स्लें पकी हुई हों तो बारिश फ़ुज़ूल है — Shahid Zaki
इतना मसरूफ़ हूँ जीने की हवस में 'शाहिद' साँस लेने की भी फ़ुर्सत नहीं होती मुझ को — Shahid Zaki
मैं तो ख़ुद बिकने को बाज़ार में आया हुआ हूँ और दुकाँ-दार ख़रीदार समझते हैं मुझे — Shahid Zaki
मैं बदलते हुए हालात में ढल जाता हूँ देखने वाले अदाकार समझते हैं मुझे — Shahid Zaki
हो न हो एक ही तस्वीर के दो पहलू हैं रक़्स करता हुआ तू आग में जलता हुआ मैं — Shahid Zaki

Ghazal

फ़रेब देती हुई मेहरबानियों से मुझे किसी ने खींच लिया ख़ुश-गुमानियों से मुझे खुला कि मैं अभी अज़बर नहीं हुआ उस को वो याद रखता है मेरी निशानियों से मुझे मैं अपने आप को शक की नज़र से देखता हूँ वो दुख मिले हैं तेरी बद-गुमानियों से मुझे मैं जानता हूँ किसी रोज़ बेचने के लिए बचा रहा है कोई राएगाँनियों से मुझे मेरे ख़ुदा मेरे माथे पे जावेदाँ लिख कर किया है किस लिए मंसूब फ़ानियों से मुझे मैं इक ख़ज़ाना हूँ पहचान को तरसता हुआ निकालता ही नहीं कोई पानियों से मुझे कुछ इस लिए भी मेरी नींद उड़ गई 'शाहिद' सुला रहा था वो सच्ची कहानियों से मुझे — Shahid Zaki
काफ़ी नहीं कि चेहरे से चेहरे उतार दूँ तू चाहता है मैं तेरे कपड़े उतार दूँ कुत्ते करे ख़ुदाई तो कैसे उतार दूँ मिट्टी में लाश किस के भरोसे उतार दूँ दरिया-ए-सुस्त मेरे तमव्वुज के साथ चल ऐसा न हो मैं तुझे किनारे उतार दूँ लाशों भरी ज़मीं ने कहा आसमान से मैं भी अगर तुम्हारे सितारे उतार दूँ बच्चे जवान और शजर बूढ़े हो गए अब वक़्त हो चला है कि झूले उतार दूँ मक़्दूर हो तो रस्म-ए-मुसावात चल पड़े मंज़ूर हो तो क़ब्रों से कत्बे उतार दूँ मुमकिन है दूर ग़ैरत-ए-सैलाब जाग उठे सूखे समुंदरों में सफ़ीने उतार दूँ गर्द-ओ-ग़ुबार से परे लटकी हुई धनक तू थक गई है तो तुझे नीचे उतार दूँ माहौल साफ़ हो तो बदन साफ़ रहते हैं ला मैं तेरे मकान से जाले उतार दूँ ठहरे हुए समय मेरे हाथों में हाथ दे गाहे तुझे चढ़ाऊँ दूँ गाहे उतार दूँ दिल तक जो जीने आए थे मा'दूम हो चुके तुझ को कहाँ उतार दूँ कैसे उतार दूँ खींचू तवह्हुम और तवक्कुल में इक लकीर दलदल में नाव लहर में तिनके उतार दूँ मेह्र-ओ-मह-ओ-नुजूम कोई मसअला नहीं बस आप हुक्म कीजिए कितने उतार दूँ 'शाहिद' अगर दुआ की उड़न-तश्तरी को मैं दोज़ख़ से और बहिश्त से आगे उतार दूँ — Shahid Zaki
अगर दोनों तरफ़ सूरज तराज़ू में नहीं होता तेरा साया मेरे साए के पहलू में नहीं होता वफ़ादारी का दावा गिर्या-ओ-ज़ारी से क्या करना नमक जो ख़ून में होता है आँसू में नहीं होता मुझे अच्छा कहाँ लगता है बैसाखी में ढल जाना मगर मेरा शुमार अब दस्त-ओ-बाज़ू में नहीं होता तो क्या तुम हिज्र के लुग़वी मआ'नी में मुक़य्यद हो तो क्या तुम कह रही हो फूल ख़ुशबू में नहीं होता सहारा हो न हो मैं नाव ले जाऊँगा साहिल तक हुनर मल्लाह में होता है चप्पू में नहीं होता हर इक उम्मीद को लाज़िम है इक ज़रख़ेज़ मायूसी उजाला रात में होता है जुगनू में नहीं होता मसाफ़त मुंतज़िर है बाप की पगड़ी के पेचों में ये वो इदराक है जो माँ के पल्लू में नहीं होता मुझे दरवेश की इस रम्ज़ ने ज़िंदा रखा 'शाहिद' कि ज़हर एहसास में होता है बिच्छू में नहीं होता — Shahid Zaki
ज़र-ए-सरिश्क फ़ज़ा में उछालता हुआ मैं बिखर चला हूँ ख़ुशी को सँभालता हुआ मैं अभी तो पहले परों का भी क़र्ज़ है मुझ पर झिजक रहा हूँ नए पर निकालता हुआ मैं किसी जज़ीरा-ए-पुर-अम्न की तलाश में हूँ ख़ुद अपनी राख समुंदर में डालता हुआ मैं फलों के साथ कहीं घोंसले न गिर जाएँ ख़याल रखता हूँ पत्थर उछालता हुआ मैं ये किस बुलंदी पे ला कर खड़ा किया है मुझे कि थक गया हूँ तवाज़ुन सँभालता हुआ मैं वो आग फैली तो सब कुछ सियाह राख हुआ कि सो गया था बदन को उजालता हुआ मैं बिछड़ गया हूँ ख़ुद अपने मक़ाम से 'शाहिद' भटकने वालों को रस्ते पे डालता हुआ मैं — Shahid Zaki
मैं अपने हिस्से की तन्हाई महफ़िल से निकालूँगा जो ला-हासिल ज़रूरी है तो हासिल से निकालूँगा मिरे ख़ूँ से ज़्यादा तू मिरी मिट्टी में शामिल है तुझे दिल से निकालूँगा तो किस दिल से निकालूँगा मुझे मालूम है इक चोर दरवाज़ा अक़ब में है मगर इस बार मैं रस्ता मुक़ाबिल से निकालूँगा शबीहों की तरह क़ब्रें मुझे आवाज़ देती हैं मैं अक्स-ए-रफ़्तगां आईना-ए-गुल से निकालूँगा हुजूम-ए-सहल-अँगाराँ मिरे हमराह चलता है मैं जैसे राह-ए-आसाँ राह-ए-मुश्किल से निकालूँगा भरम सब खोल के रख दूँगा मसनूई मोहब्बत के कोई ताज़ा फ़साना दश्त-ओ-महमिल से निकालूँगा तुम्हें अब तैरना ख़ुद सीख लेना चाहिए 'शाहिद' तुम्हें कब तक मैं गिर्दाब-ए-मसाएल से निकालूँगा — Shahid Zaki
जिधर भी देखिए इक रास्ता बना हुआ है सफ़र हमारे लिए मसअला बना हुआ है मैं सर-ब-सज्दा सकूँ में नहीं सफ़र में हूँ जबीं पे दाग़ नहीं आबला बना हुआ है मैं क्या करूँँ मिरा गोशा-नशीन होना भी पड़ोसियों के लिए वाक़िआ' बना हुआ है मगर मैं इश्क़ में परहेज़ से बंधा हुआ हूँ तिरा वजूद तो ख़ुश-ज़ाएक़ा बना हुआ है बुरीदा शाख़ें हैं या शम्'अ-हा-ए-गुल-शुदा हैं ख़मीदा पेड़ है या मक़बरा बना हुआ है मिरे गुनह दर-ओ-दीवार से झलक रहे हैं मकान मेरे लिए आईना बना हुआ है शुऊरी कोशिशें मंज़र बिगाड़ देती हैं वही भला है जो बे-साख़्ता बना हुआ है किसी दुआ के लिए हाथ उठे हुए 'शाहिद' किसी दिए के लिए ताक़चा बना हुआ है — Shahid Zaki
बिछड़ गया था कोई ख़्वाब-ए-दिल-नशीं मुझ से बहुत दिनों मिरी आँखें जुदा रहीं मुझ से मैं साँस तक नहीं लेता पराई ख़ुशबू में झिझक रही है यूँँही शाख़-ए-यासमीं मुझ से मिरे गुनाह की मुझ को सज़ा नहीं देता मिरा ख़ुदा कहीं नाराज़ तो नहीं मुझ से ये शाहकार किसी ज़िद का शाख़साना है उलझ रहा था बहुत नक़्श-ए-अव्वलीं मुझ से मैं तख़्त पर हूँ मगर यूँँ तो ख़ाक-ज़ादा ही गुरेज़ करते हैं क्यूँँ बोरिया-नशीं मुझ से उजड़ उजड़ के बसे हैं मिरे दर-ओ-दीवार बिछड़ बिछड़ के मिले हैं मिरे मकीं मुझ से बिखर रही है तप-ए-इंतिक़ाम से मिरी ख़ाक गुज़र रही है कोई मौज-ए-आतिशीं मुझ से मुहाल है कि तमाशा तमाम हो 'शाहिद' तमाश-बीन से मैं ख़ुश तमाश-बीं मुझ से — Shahid Zaki
किसी कमज़र्फ़ का एहसान मेरा मसअला है अब चढ़ाई नहीं ढलवान मेरा मसअला है ला तेरे सारे गुनाह अपनी जबीं पर लिख लूँ छोड़ ईमान को ईमान मेरा मसअला है मुझ को मुर्दों नहीं मर्दों की तरह देखिएगा मैं जो ज़िंदा हूँ तो ज़िंदान मेरा मसअला है मेरी कोशिश है कि मैं ख़ुद से रिहा हो जाऊँ तुम समझते हो कि निर्वान मेरा मसअला है ख़ुद को तरतीब से रखते हुए रुक जाता हूँ मुझ में ठहरा हुआ तूफ़ान मेरा मसअला है मैं कि बर्बाद भी आबाद नज़र आता हूँ नज़र आता हूँ कि पहचान मेरा मसअला है कश्मकश हो तो मक़ामात बदल जाते हैं या'नी अब मुझ से परेशान मेरा मसअला है जिस जगह कुछ नहीं सब कुछ है वहीं पर 'शाहिद' अदम इमकान में इमकान मेरा मसअला है — Shahid Zaki
ज़ंजीर कट के क्या गिरी आधे सफ़र के बीच मैं सर पकड़ के बैठ गया रहगुज़र के बीच उतरा लहद में ख़्वाहिशों के साथ आदमी जैसे मुसाफ़िरों-भरी नाव भँवर के बीच दुश्मन से क्या बचाएँगी ये झाड़ियाँ मुझे बचते नहीं यहाँ तो पयम्बर शजर के बीच जितना उड़ा मैं उतना उलझता चला गया इक तार-ए-कम-नुमा था मिरे बाल-ओ-पर के बीच देते हो दस्तकें यहाँ सर फोड़ते हो वाँ कुछ फ़र्क़ तो रवा रखो दीवार-ओ-दर के बीच घर से चला तो घर की उदासी सिसक उठी मैं ने उसे भी रख लिया रख़्त-ए-सफ़र के बीच थकने के हम नहीं थे मगर अब के यूँँ हुआ देता रहा फ़रेब सितारा सफ़र के बीच मेरा सभी के साथ रवय्या है एक सा 'शाहिद' मुझे तमीज़ नहीं ख़ैर ओ शर के बीच — Shahid Zaki
तेरी मर्ज़ी के ख़द-ओ-ख़ाल में ढलता हुआ मैं ख़ाक से आब न हो जाऊँ पिघलता हुआ मैं ऐ ख़िज़ाँ मैं तुझे ख़ुश-रंग बना सकता था तुझ से देखा न गया फूलता-फलता हुआ मैं मुझ को माँगी हुई इज़्ज़त नहीं पूरी आती टूट जाऊँ न ये पोशाक बदलता हुआ मैं शोबदा-गर नहीं मेहमान-ए-सफ़-ए-याराँ हूँ ज़हर पीता हुआ और शहद उगलता हुआ मैं यम-ब-यम रूह मचलती हुई मछली की तरह दम-ब-दम वक़्त के हाथों से फिसलता हुआ मैं अब मिरी राख उड़ा या मुझे आँखों से लगा तुझ तलक आ गया हूँ आग पे चलता हुआ मैं कह रही हैं मुझे वो हौसला-अफ़्ज़ा आँखें रूह तक जाऊँ ख़द-ओ-ख़ाल मसलता हुआ मैं हो न हो एक ही तस्वीर के दो पहलू हैं रक़्स करता हुआ तू आग में जलता हुआ मैं कार-ए-दरवेशी जज़ा-याब है लेकिन 'शाहिद' ख़ुश नहीं ख़ल्वत-ए-ख़ाली से बहलता हुआ मैं — Shahid Zaki
बस रूह सच है बाक़ी कहानी फ़रेब है जो कुछ भी है ज़मीनी ज़मानी फ़रेब है रंग अपने अपने वक़्त पे खुलते हैं आँख पर अव्वल फ़रेब है कोई सानी फ़रेब है सौदागरान-ए-शोलगी-ए-शर के दोश पर मुश्कीज़-गाँ से झाँकता पानी फ़रेब है इस घूमती ज़मीं पे दोबारा मिलेंगे हम हिजरत फ़रार नक़्ल-ए-मकानी फ़रेब है दरिया की अस्ल तैरती लाशों से पूछिए ठहराव एक चाल रवानी फ़रेब है अब शाम हो गई है तो सूरज को रोइए हम ने कहा न था कि जवानी फ़रेब है बार-ए-दिगर समय से किसी का गुज़र नहीं आइंदगाँ के हक़ में निशानी फ़रेब है इल्म इक हिजाब और हवा से आइने का ज़ंग निस्यान हक़ है याद-दहानी फ़रेब है तज्सीम कर कि ख़्वाब की दुनिया है जावेदाँ तस्लीम कर कि आलम-ए-फ़ानी फ़रेब है 'शाहिद' दारोग़-गोई-ए-गुलज़ार पर न जा तितली से पूछ रंग-फ़िशानी फ़रेब है — Shahid Zaki
मेरे ख़ुदा किसी सूरत उसे मिला मुझ से मेरे वजूद का हिस्सा न रख जुदा मुझ से वो ना-समझ मुझे पत्थर समझ के छोड़ गया वो चाहता तो सितारे तराशता मुझ से उस एक ख़त ने सुख़न-वर बना दिया मुझ को वो एक ख़त कि जो लिक्खा नहीं गया मुझ से उसे ही साथ गवारा न था मेरा वर्ना किसे मजाल कोई उस को छीनता मुझ से अभी विसाल के ज़ख़्मों से ख़ून रिसता है अभी ख़फ़ा है मोहब्बत का देवता मुझ से है आरज़ू कि पलट जाऊँ आसमाँ की तरफ़ मिज़ाज अहल-ए-ज़मीं का नहीं मिला मुझ से ख़ता के बा'द अजब कश्मकश रही 'शाहिद' ख़ता से मैं रहा शर्मिंदा और ख़ता मुझ से — Shahid Zaki