itna masroof hoon jeene ki havas mein shaahid | इतना मसरूफ़ हूँ जीने की हवस में 'शाहिद'

  - Shahid Zaki

इतना मसरूफ़ हूँ जीने की हवस में 'शाहिद'
साँस लेने की भी फ़ुर्सत नहीं होती मुझ को

  - Shahid Zaki

Romantic Shayari

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    कूज़े बनाने वाले को उजलत अजीब थी
    पूरे नहीं बनाए थे सारे बनाए थे

    अब इशरत-ओ-नशात का सामान हूँ तो हूँ
    हम ने तो दीप ख़ौफ़ के मारे बनाए थे

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    पानी से जिस ने जिस्म हमारे बनाए थे

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