ये मुझे नींद में चलने की जो बीमारी है
मुझ को इक ख़्वाब-सरा अपनी तरफ़ खींचती है
मुझ को इक ख़्वाब-सरा अपनी तरफ़ खींचती है
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किसी ने कहा था टूटी हुई नाव में चलो
दरिया के साथ आप की रंजिश फ़ुज़ूल है
दरिया के साथ आप की रंजिश फ़ुज़ूल है
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ऐसा बदला हूँ तिरे शहर का पानी पी कर
झूट बोलूँ तो नदामत नहीं होती मुझ को
झूट बोलूँ तो नदामत नहीं होती मुझ को
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बिन माँगे मिल रहा हो तो ख़्वाहिश फ़ुज़ूल है
सूरज से रौशनी की गुज़ारिश फ़ुज़ूल है
सूरज से रौशनी की गुज़ारिश फ़ुज़ूल है
किसी ने कहा था टूटी हुई नाव में चलो
दरिया के साथ आप की रंजिश फ़ुज़ूल है
नाबूद के सुराग़ की सूरत निकालिए
मौजूद की नुमूद ओ नुमाइश फ़ुज़ूल है
मैं आप अपनी मौत की तय्यारियों में हूँ
मेरे ख़िलाफ़ आप की साज़िश फ़ुज़ूल है
ऐ आसमान तेरी इनायत बजा मगर
फ़सलें पकी हुई हों तो बारिश फ़ुज़ूल है
जी चाहता है कह दूँ ज़मीन ओ ज़माँ से मैं
मंज़िल अगर नहीं है तो गर्दिश फ़ुज़ूल है
इनआम-ए-नंग-ओ-नाम मिरे काम के नहीं
मज्ज़ूब हूँ सो मेरी सताइश फ़ुज़ूल है
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अब कोई आए चला जाए मैं ख़ुश रहता हूँ
अब किसी शख़्स की आदत नहीं होती मुझ को
ऐसा बदला हूँ तिरे शहर का पानी पी कर
झूट बोलूँ तो नदामत नहीं होती मुझ को
है अमानत में ख़यानत सो किसी की ख़ातिर
कोई मरता है तो हैरत नहीं होती मुझ को
तू जो बदले तिरी तस्वीर बदल जाती है
रंग भरने में सुहूलत नहीं होती मुझ को
अक्सर औक़ात मैं ता'बीर बता देता हूँ
बाज़ औक़ात इजाज़त नहीं होती मुझ को
इतना मसरूफ़ हूँ जीने की हवस में 'शाहिद'
साँस लेने की भी फ़ुर्सत नहीं होती मुझ को
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यार भी राह की दीवार समझते हैं मुझे
मैं समझता था मिरे यार समझते हैं मुझे
मैं समझता था मिरे यार समझते हैं मुझे
जड़ उखड़ने से झुकाव है मिरी शाख़ों में
दूर से लोग समर-बार समझते हैं मुझे
क्या ख़बर कल यही ताबूत मिरा बन जाए
आप जिस तख़्त का हक़दार समझते हैं मुझे
नेक लोगों में मुझे नेक गिना जाता है
और गुनहगार गुनहगार समझते हैं मुझे
मैं तो ख़ुद बिकने को बाज़ार में आया हुआ हूँ
और दुकाँ-दार ख़रीदार समझते हैं मुझे
मैं बदलते हुए हालात में ढल जाता हूँ
देखने वाले अदाकार समझते हैं मुझे
वो जो उस पार हैं इस पार मुझे जानते हैं
ये जो इस पार हैं उस पार समझते हैं मुझे
मैं तो यूँ चुप हूँ कि अंदर से बहुत ख़ाली हूँ
और ये लोग पुर-असरार समझते हैं मुझे
रौशनी बाँटता हूँ सरहदों के पार भी मैं
हम-वतन इस लिए ग़द्दार समझते हैं मुझे
जुर्म ये है कि इन अंधों में हूँ आँखों वाला
और सज़ा ये है कि सरदार समझते हैं मुझे
लाश की तरह सर-ए-आब हूँ मैं और 'शाहिद'
डूबने वाले मदद-गार समझते हैं मुझे
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हो न हो एक ही तस्वीर के दो पहलू हैं
रक़्स करता हुआ तू आग में जलता हुआ मैं
रक़्स करता हुआ तू आग में जलता हुआ मैं
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