भरोसा उठ गया मेरा सुख़न-संजी दिवानों से
मुझे अब दाद भी मिलती नहीं है क़द्र-दानों से
हुआ है जब से उठना बैठना याँ मुफ़लिसों के साथ
सदा मुझ को कोई देता नहीं ऊँचे मकानों से
उन्हें आशिक़ कोई ऐसा नज़र आता नहीं याँ सो
सितारे ख़ुद ही नीचे आते हैं अब आसमानों से
असर जब से हुआ है गाँवों पर चमकीले शहरों का
मिला करते नहीं सुनने को अब क़िस्से सयानों से
गवाहों पर भरोसा हद से ज़्यादा ठीक नइँ सैंडी
पलट जाती हैं अक्सर बाज़ियाँ कुछ ही बयानों से
— Sandeep dabral 'sendy'















