Anand Narayan Mulla

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Anand Narayan Mulla shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Anand Narayan Mulla's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

इश्क़ में वो भी एक वक़्त है जब बे-गुनाही गुनाह है प्यारे — Anand Narayan Mulla
जब अपना दिल ख़ुद ले डूबे औरों पे सहारा कौन करे कश्ती पे भरोसा जब न रहा तिनकों पे भरोसा कौन करे — Anand Narayan Mulla

Ghazal

फ़लक के न इन माह-पारों को देखो जो मिट्टी में हैं उन सितारों को देखो कभी कारवाँ भी नुमूदार होगा निगाहें जमाए ग़ुबारों को देखो निकल कर कभी शहर-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ से मोहब्बत के उजड़े दयारों को देखो चमन में ये किस चाल से चल रहे हो न फूलों को देखो न ख़ारों को देखो ज़बाँ हुस्न की मो'तबर कब हुई है किनायों को समझो इशारों को देखो मुसल्लेह क़तारें इधर भी उधर भी ज़रा अम्न की राह-गुज़ारों को देखो चमन की ख़िज़ाँ पर न आँसू बहाओ नज़र है तो कल की बहारों को देखो न देखो दरख़्तों की दूरी चमन में लिपटती हुई शाख़-सारों को देखो ज़रा झाँक कर ग़ुर्फ़ा-ए-मयकदास तरसते लबों की क़तारों को देखो किसी के सितम को भी समझते तवज्जोह अरे इन तग़ाफ़ुल के मारों को देखो वो दौर-ए-हयात-ए-जहाँ आ गया है भँवर में रहो और किनारों को देखो बढ़ो और हाथों का इक पल बना लो किनारों से कब तक सवारों को देखो बिना-ए-बक़ा धमकीयों पर फ़ना की नए जग के परवरदिगारों को देखो कभी नाम-ए-'मुल्ला' न आया ज़बाँ तक ये दुनिया है 'मुल्ला' के यारों को देखो — Anand Narayan Mulla
सुब्ह-ए-नौ आ गई तीरगी मिट गई शोर है हर तरफ़ इंक़लाब आ गया मुझ को डर है अँधेरा कोई रात का मुँह पे डाले सहर की नक़ाब आ गया हुस्न की ये अदा भी है कितनी हसीं इक तबस्सुम में सब कुछ है कुछ भी नहीं अपनी अपनी समझ अपना अपना यक़ीं हर सवाल नज़र का जवाब आ गया बज़्म-ए-हस्ती में हंगामा बरपा किए कोई गीता लिए कोई क़ुरआँ लिए मैं भी साक़ी के हाथों से पाई थी जो ले के अपनी सुनहरी किताब आ गया फ़ितरत-ए-हुस्न को कौन समझे भला गह अता ही अता गह जफ़ा ही जफ़ा गाह तक़्सीर की और हँसी आ गई गाह सज्दे किए और इ'ताब आ गया ज़ीस्त की तल्ख़ियाँ अल-अमाँ फिर भी वो छीन पाएँ न मेरे लबों से हँसी इश्क़ तू ने दिया वो ग़म-ए-शादमाँ हो के नाकाम मैं कामयाब आ गया गर्दिश-ए-रोज़-ओ-शब ने न जाने कहाँ की निकाली है 'मुल्ला' से ये दुश्मनी उस ने साग़र उठाया सहर हो गई उस ने साग़र रखा माहताब आ गया — Anand Narayan Mulla
फ़ित्ना फिर आज उठाने को है सर लगता है ख़ून ही ख़ून मुझे रंग-ए-सहर लगता है इल्म की देव-क़दी देख के डर लगता है आसमानों से अब इंसान का सर लगता है मुझ को लगता है नशेमन की मिरे ख़ैर नहीं जब किसी शाख़ पे गुलशन में तबर लगता है मान लो कैसे कि मैं ऐब सरापा हूँ फ़क़त मेरे अहबाब का ये हुस्न-ए-नज़र लगता है कल जिसे फूँका था या कह के कि दुश्मन का है घर सोचता हूँ तो वो आज अपना ही घर लगता है फ़न है वो रोग जो लगता नहीं सब को लेकिन जिस को लगता है उसे ज़िंदगी-भर लगता है एहतियातन कोई दर फोड़ लें दीवार में और शोर बढ़ता हुआ कुछ जानिब-ए-दर लगता है एक दरवाज़ा है हर-सम्त निकलने के लिए हो न हो ये तो मुझे शैख़ का घर लगता है चमन-ए-शे'र में हूँ इक शजर-ए-ज़िंदा मगर अभी 'मुल्ला' मिरी डाली ये समर लगता है — Anand Narayan Mulla
गुलशन है इसी का नाम अगर हैराँ हूँ बयाबाँ क्या होगा हंगाम-ए-बहाराँ जब ये है अंजाम-ए-बहाराँ क्या होगा साक़ी के दयार-ए-रहमत में हिंदू-ओ-मुसलमाँ क्या होगा इस बज़्म-ए-पाक-नहादाँ में आलूदा-ए-ईमाँ क्या होगा ये जंग तो लड़ना ही होगी हर बर्ग से चाहे ख़ूँ टपके काँटों से जो गुल डर जाएगा दारा-ए-गुलिस्ताँ क्या होगा उल्फ़त को मिटाने के दर पे दुनिया और मैं इस सोच में हूँ उल्फ़त न रहेगी जब बाक़ी ख़्वाब-ए-दिल-ए-इंसाँ क्या होगा मैं दूर भी तुम से जी लूँगा तुम मेरे लिए कुछ ग़म न करो माना कि परेशाँ दिल होगा ऐसा भी परेशाँ क्या होगा जिस हाथ में है शमशीर-ओ-तीर क्या उस से उमीद-ए-बर्ग-ओ-समर जो शाख़-ए-नशेमन तोड़ेगा मेमार-ए-गुलिस्ताँ क्या होगा किस शय पे अभी हम जश्न करें हर-सू काँटे कूड़ा-करकट कुछ रंग-ए-चमन आए तो सही घूरे पे चराग़ाँ क्या होगा जो तिश्ना-लबों के हक़ के लिए साक़ी से लड़े वो रिंद कहाँ जो दस्त-ओ-दहाँ का ख़ूगर है वो दस्त-ओ-गरेबाँ क्या होगा साक़ी की ग़ुलामी कर लेगा और वो भी कुछ क़तरों के लिए नादान सही मुल्ला लेकिन इतना भी वो नादाँ क्या होगा आवाज़-ए-ज़मीर अपनी सुन कर 'मुल्ला' ने बना ली राह-ए-अमल ये फ़िक्र कभी उस को न हुई अंदाज़-ए-हरीफ़ाँ क्या होगा — Anand Narayan Mulla
अब अपने दीदा-ओ-दिल का भी ए'तिबार नहीं उसी को प्यार किया जिस के दिल में प्यार नहीं नहीं कि मुझ को तबीअ'त पे इख़्तियार नहीं हर इक जाम से पी लूँ वो बादा-ख़्वार नहीं हर एक गाम पे काँटों की हैं कमीं-गाहें शबाब आह शगूफ़ों की रहगुज़ार नहीं भरी हुई है वो काम-ओ-दहन में तल्ख़ी-ए-ज़ीस्त कि लब पे जाम-ए-मोहब्बत भी ख़ुश-गवार नहीं न मेरे अश्कों से दामन पे तेरे आएगी आँच ये शो'ला-रू हैं मगर फ़ितरत-ए-शरार नहीं कहीं छुपाए से छुपती भी है हक़ीक़त-ए-ग़म वो ग़म ही क्या जो मसर्रत से आश्कार नहीं मैं तेरी याद से बहका चुका हूँ यूँँ दिल को कि अब मुझे तिरी फ़ुर्क़त भी नागवार नहीं मिरे सुकूँ के लिए क्यूँँ ये कोशिश-ए-पैहम क़रार छीनने वाले तुझे क़रार नहीं जहान-ए-अक़्ल के नफ़रत-कदों में बट जाता हज़ार शुक्र मोहब्बत पे इख़्तियार नहीं किसी की लूट के राहत ख़ुशी नहीं मिलती ख़िज़ाँ के हाथ में सर्माया-ए-बहार नहीं निगाह-ए-दोस्त को इस की भी है ख़बर लेकिन वो राज़ जिस का अभी दिल भी राज़दार नहीं तवज्जा-ए-निगह-ए-यार का सबब मा'लूम दिल-ए-गिरफ़्ता-ए-'मुल्ला' अभी शिकार नहीं — Anand Narayan Mulla
देखा कुछ आज यूँँ किसी ग़फ़लत-शिआ'र ने मैं अपनी उम्र-ए-रफ़्ता को दौड़ा पुकारने हंगामा-ए-शबाब की पोंछो न सर-गुज़श्त अपने चमन को लूट लिया ख़ुद बहार ने पैकान-ए-तीर ज़हर में इतने बुझे न थे कुछ और कर दिया है नज़र को ख़ुमार ने तम्मत-ब-ख़ैर दिल की शिकायत की दास्ताँ होंटों को सी दिया निगह-ए-शर्मसार ने हिम्मत पड़ी न शैख़ से कहने की मोहतसिब आए हो इक ग़रीब पे ग़ुस्सा उतारने वो तो कहो कि आई क़फ़स तक भी बू-ए-गुल वर्ना भुला दिया था हमें तो बहार ने जो तंग-ए-गुल थे तुर्रा-ए-दस्तार बन गए जो गुल थे आए तुर्बत-ए-बे-कस सँवारने आए हो क्या तुम्हीं मुझे आवाज़ दो ज़रा आँखों का नूर छीन लिया इंतिज़ार ने आलाम-ए-रोज़गार से 'मुल्ला' को क्या ग़रज़ अपना बना लिया है उसे चश्म-ए-यार ने — Anand Narayan Mulla
साथ हो कोई तो कुछ तस्कीन सी पाता हूँ मैं तेरे आगे जा के तन्हा और घबराता हूँ मैं सामने आते ही उन के चुप सा हो जाता हूँ मैं जैसे ख़ुद अपनी तमन्नाओं से शरमाता हूँ मैं इक मुसलसल ज़ब्त ही का नाम शायद इश्क़ है अब तो नज़रों तक को आँखों ही में पी जाता हूँ मैं देख सकते काश तुम मेरी तमन्नाओं का जश्न जब उन्हें झूटी उम्मीदें दे के बहलाता हूँ मेरे पैरों को है कुछ रौंदी हुई राहों से बैर जिस तरफ़ कोई नहीं जाता उधर जाता हूँ मैं इक निगाह-ए-लुत्फ़ आते ही वही है हाल-ए-दिल सब पुराने तजरबों को भूल सा जाता हूँ मैं ये मिरे अश्क-ए-मुसलसल बस मुसलसल अश्क हैं कौन कहता है तुम्हारा नाम दोहराता हूँ मैं शाम-ए-ग़म क्या क्या तसव्वुर की हैं चीरा-दस्तियाँ हाँ तुम्हें भी तुम से बिन पूछे उठा लाता हूँ मैं कारोबार-ए-इश्क़ में दुनिया की झूटी मस्लहत मुझ को समझाते हैं वो और दिल को समझाता हूँ मैं साथ तेरे ज़िंदगी का वो तसव्वुर में सफ़र जैसे फूलों पर क़दम रखता चला जाता हूँ मैं रंज-ए-इंसाँ की हक़ीक़त में तो समझा हूँ यही आज दुनिया में मोहब्बत की कमी पाता हूँ मैं मेरे आँसू में ख़ुश्बू मेरे हर नाले में राग अब तो हर इक साँस में शामिल तुम्हें पाता हूँ मैं अब तमन्ना बे-सदा है अब निगाहें बे-पयाम ज़िंदगी इक फ़र्ज़ है जीता चला जाता हूँ मैं हाए 'मुल्ला' कब मिली ख़ामोशी-ए-उल्फ़त की दाद कोई अब कहता है कुछ उन से तो याद आता हूँ मैं — Anand Narayan Mulla
ज़ीस्त है इक मासियत सोज़-ए-दिली तेरे बग़ैर हाँ मोहब्बत भी है इक आलूदगी तेरे बग़ैर शाम-ए-ग़म तेरे तसव्वुर ही से आँखों में चराग़ वर्ना मेरे घर में हो और रौशनी तेरे बग़ैर ये जहाँ तन्हा भला क्या मुझ को दे पाता शिकस्त मैं ने कब खाया फ़रेब-ए-दोस्ती तेरे बग़ैर रात के सीना में है इक ज़ख़्म जिस का नाम चाँद इक सुनहरी जू-ए-ख़ूँ है चाँदनी तेरे बग़ैर हर-नफ़स है पै-ब-पै नाकामियों का सामना ज़ीस्त है इक मुस्तक़िल शर्मिंदगी तेरे बग़ैर दे गई धोका मगर शाइस्तगी-ए-ग़म मिरी आ रहा है दिल पे इल्ज़ाम-ए-ख़ुशी तेरे बग़ैर इल्म-ओ-अक़्ल-ओ-नाम-ओ-जाह-ओ-ज़ोर-ओ-ज़र सब हेच इश्क़ हो के सब कुछ भी नहीं कुछ आदमी तेरे बग़ैर दिल की शादाबी की ज़ामिन है तू ही ऐ याद-ए-दोस्त आ न पाई ग़म के फूलों में नमी तेरे बग़ैर एक इक लम्हे में जब सदियों की सदियाँ कट गईं ऐसी कुछ रातें भी गुज़री हैं मिरी तेरे बग़ैर ज़िंदगी 'मुल्ला' की है महजूब नाम-ए-ज़िंदगी रह गई है शाइ'री ही शाइ'री तेरे बग़ैर — Anand Narayan Mulla
झिजक इज़हार-ए-अरमाँ की ब-आसानी नहीं जाती ख़ुद अपने शौक़ की दिल से पशेमानी नहीं जाती तड़प शीशे के टुकड़े भी उड़ा लेते हैं हीरे की मोहब्बत की नज़र जल्दी से पहचानी नहीं जाती उफ़ुक़ पर नूर रह जाता है सूरज डूबने पर भी कि दिल बुझ कर भी नज़रों की दरख़शानी नहीं जाती सू-ए-दिल आ के अब चश्म-ए-करम भी क्या बना लेगी शुआ-ए-मेहरस सहरा की वीरानी नहीं जाती ये बज़्म-ए-दैर-ओ-काबा है नहीं कुछ सेहन-ए-मय-ख़ाना ज़रा आवाज़ गूँजी और पहचानी नहीं जाती किसी के लुत्फ़-ए-बे-पायाँ ने कुछ यूँँ सू-ए-दिल देखा कि अब ना-कर्दा जुर्मों की पशेमानी नहीं जाती तग़ाफ़ुल पर न जा उस के तग़ाफ़ुल एक धोका है निगाह-ए-दोस्त की तहरीक-ए-पिन्हानी नहीं जाती नज़र झूटी शबाब अंधा वो हुस्न इक नक़्श-ए-फ़ानी है हक़ीक़त है तो हो लेकिन अभी मानी नहीं जाती मुयस्सर है हर इक ईमाँ में मुझ को ज़ौक़ का सज्दा कोई मज़हब भी हो बुनियाद-ए-इंसानी नहीं जाती नज़र जिस की तरफ़ कर के निगाहें फेर लेते हो क़यामत तक फिर उस दिल की परेशानी नहीं जाती न समझो ज़ब्त-ए-गिर्या से ख़ता पर मैं नहीं नादिम कि आँसू पोंछ लेने से पशेमानी नहीं जाती न पोंछो तजरबात-ए-ज़िंदगानी चोट लगती है नज़र अब दोस्त और दुश्मन की पहचानी नहीं जाती ज़माना करवटों पर करवटें लेता है और 'मुल्ला' तिरी अब तक वो ख़्वाब-आवर ग़ज़ल-ख़्वानी नहीं जाती — Anand Narayan Mulla
ग़म के बादल फिर भी छाए रह गए आँख से दरिया के दरिया बह गए ख़ौफ़-ए-उक़्बा और इस दुनिया के बा'द वो भी सह लेंगे जो ये ग़म सह गए किस ने देखा है जमाल-ए-रू-ए-दोस्त सब नक़ाबों में उलझ कर रह गए मुख़्तसर थी दास्तान-ए-अर्ज़-ए-शौक़ बुझ के कुछ तारे मिज़ा पर रह गए ज़ीस्त है इक शाम अफ़्साने का नाम अपनी अपनी दास्ताँ सब कह गए तब कहीं जा कर मिली सत्ह-ए-सुकूँ डूब कर जब ग़म में तह-दर-तह गए वार कर के ज़ीस्त भागी और हम आस्तीं अपनी चढ़ाते रह गए चंद शैताँ बंद कर के ख़ुश हैं यूँँ जैसे बाहर सब फ़रिश्ते रह गए अश्क बन पाए न ग़म के तर्जुमाँ ये नुमाइश ही में अपनी रह गए ज़िंदगी से लड़ न पाया जोश-ए-दिल पर बहुत तोले मगर रह रह गए अश्क थे जब तक फ़रोज़ाँ ग़म न था अब अँधेरे में अकेले रह गए जेबें सब यारों ने भर लीं बज़्म में एक 'मुल्ला' थे जो यूँँही रह गए — Anand Narayan Mulla
चीज़ दिल है रुख़-ए-गुलफ़ाम में क्या रक्खा है कैफ़ सहबा में है ख़ुद जाम में क्या रक्खा है गुनगुनाता हुआ दिल चाहिए जीने के लिए इस नज़ा-ए-सह्र-ओ-शाम में क्या रक्खा है कौन किस तरह से होता है हरीफ़-ए-मय-ए-ज़ीस्त और तल्ख़ाबा-ए-अय्याम में क्या रक्खा है इश्क़ करता है तो कर और निगाहों को बुलंद रिश्ता-ए-रहगुज़र-ओ-बाम में क्या रक्खा है मुर्ग़-ए-आज़ाद हुआ क्या तिरी ख़ुद्दारी को चंद दानों के सिवा दाम में क्या रक्खा है हुस्न फ़नकार की इक छेड़ है इश्क़-ए-नादाँ बे-वफ़ाई के इस इल्ज़ाम में क्या रक्खा है देखना ये है कि वो दिल में मकीं है कि नहीं चाहे जिस नाम से हो नाम में क्या रक्खा है दें मिरे ज़ौक़-ए-परस्तिश को दुआएँ 'मुल्ला' वर्ना पत्थर के इन असनाम में क्या रक्खा है — Anand Narayan Mulla
हर इंक़लाब की सुर्ख़ी उन्हीं के अफ़्साने हयात-ए-दहर का हासिल हैं चंद दीवाने ख़ुदा-ए-हर-दो-जहाँ ख़ूब है तिरी तक़्सीम ज़मीं पे दैर-ओ-हरम और फ़लक पे मयख़ाने हमारी जा भी कहीं है ख़ुदा-ए-दैर-ओ-हरम हरम में ग़ैर हैं और बुत-कदे में बेगाने न पूछ दौर-ए-हक़ीक़त की सख़्तियों को न पूछ तरस गए लब-ए-अफ़्साना-गो को अफ़्साने ये जब्र ज़ीस्त-ए-मोहब्बत पे कब तलक आख़िर कि दिल सलाम करें और नज़र न पहचाने अलग अलग से उफ़ुक़ पर हैं छोटे छोटे ग़ुबार ये कारवाँ को मिरे क्या हुआ ख़ुदा जाने निज़ाम-ए-मयकदा साक़ी चलेगा यूँँ कब तक छलक रहे हैं सुबू और तही हैं पैमाने — Anand Narayan Mulla
हयात इक साज़-ए-बे-सदा थी सुरूद-ए-उम्र-ए-रवाँ से पहले बशर की तक़दीर सो रही थी ख़ता-ए-बाग़-ए-जिनाँ से पहले नज़र ने की नज़र-ए-रूह-ओ-दिल पेश-ए-लब पे शोर-ए-फ़ुग़ाँ से पहले अदा हुआ सज्दा-ए-मोहब्बत ख़रोश-ए-बांग-ए-अज़ाँ से पहले बदल गया इश्क़ का ज़माना कहाँ से पहुँचा कहाँ फ़साना उन्हें भी मुझ पर ज़बान आई वही जो थे बे-ज़बाँ से पहले किसे ख़बर थी कि बन के बर्क़-ए-ग़ज़ब गिरेगा यही चमन पर वो हुस्न जो मुस्कुरा रहा था नक़ाब-ए-अबर-ए-रवाँ से पहले सितम तो शायद मैं भूल जाता अगर ये नश्तर चुभा न होता वो इक निगाह-ए-करम जो की थी निगाह-ए-ना-मेहरबाँ से पहले नज़र है वीराँ मिरी तो क्या ग़म नज़र के जल्वे तो हैं सलामत न थे तुम इतने हसीं मिरी मोहब्बत-ए-राएगाँ से पहले तिरी तरफ़ फिर नज़र करूँँगा निशात-ए-हस्ती-ए-जाविदानी ख़रीद लूँ लज़्ज़त-ए-अलम कुछ मता-ए-उम्र-ए-रवाँ से पहले बिछड़ गए राह-ए-ज़ीस्त में हम तुम्हें भी इस का अगर है कुछ ग़म चलें वहीं से फिर आओ बाहम चले थे हम तुम जहाँ से पहले क़फ़स की लोहे की तीलियाँ अब उन्हीं की ज़र्बों से ख़ूँ-चकाँ हैं यही जो थे मुंतशिर से तिनके तसव्वुर-ए-आशियाँ से पहले चमन में हँसने से फिर न रोकूँगा गुंचा-ए-सादा-लौह तुझ को मगर ज़रा आश्ना तो हो जा तबीअत-ए-बाग़बाँ से पहले नज़र के शो'ले दिलों में इक आग हर दो जानिब लगा चुके हैं बस अब तो ये रह गया है बाक़ी कि लौ उठेगी कहाँ से पहले न ढूँडो 'मुल्ला' को कारवाँ में फिरेगा सहरा में वो अकेला किसी सबब से जो ता-ब-मंज़िल न आ सका कारवाँ से पहले — Anand Narayan Mulla
हवा ना-साज़गार-ए-गुल्सिताँ मा'लूम होती है अगर हँसती भी हैं कलियाँ फ़ुग़ाँ मा'लूम होती हैं ख़ुशी में अपनी ख़ुश-बख़्ती कहाँ मा'लूम होती है क़फ़स में जा के क़द्र-ए-आशियाँ मा'लूम होती है हर इक के ज़र्फ़ की वुसअ'त यहाँ मा'लूम होती है मोहब्बत आदमी का इम्तिहाँ मा'लूम होती है कभी शायद मोहब्बत का कोई हासिल निकल आए अभी तो राएगाँ ही राएगाँ मा'लूम होती है ये दिल को कर दिया कैसा किसी की कम-निगाही ने ज़रा सी फाँस चुभती है सिनाँ मा'लूम होती है खिंच आती हैं इसी साहिल पे ख़ुद दो अजनबी मौजें मोहब्बत एक जज़्ब-ए-बे-अमाँ मा'लूम होती है उफ़ुक़ ही पर अभी तक हैं तसव्वुर की हसीं शा में कहीं ठहरी हुई उम्र-ए-रवाँ मा'लूम होती हैं तुम इस हालत को क्या जानो न जानो ही तो अच्छा है हँसी जब आ के होंटों पर फ़ुग़ाँ मा'लूम होती है तिरी बे-मेहरियाँ आख़िर वो नाज़ुक वक़्त ले आएँ कि अपनों की मोहब्बत भी गराँ मा'लूम होती है नज़र आता नहीं शबनम का गिरना फूल का खिलना मोहब्बत की हक़ीक़त ना-गहाँ मा'लूम होती है चमन का दर्द है जिस दिल में तो चाहे कहीं उट्ठे उसे अपनी ही शाख़-ए-आशियाँ मा'लूम होती है नज़र फिरती थी वो पहले भी लेकिन यूँँ न फिरती थी कुछ अब की ख़त्म होती दास्ताँ मा'लूम होती है अभी ख़ाकिस्तर-ए-'मुल्ला' से उठता है धुआँ कुछ कुछ कहीं पर कोई चिंगारी तपाँ मा'लूम होती है — Anand Narayan Mulla
हर जल्वे पे निगाह किए जा रहा हूँ मैं आँखों को ख़िज़्र-ए-राह किए जा रहा हूँ मैं मिटने न पाए ताज़गी-ए-लज़्ज़त-ए-गुनाह तौबा भी गाह गाह किए जा रहा हूँ मैं कैसी ये ज़िंदगी है कि फिर भी है शौक़-ए-ज़ीस्त गौहर-नफ़स इक आह किए जा रहा हूँ मैं अश्कों की मशअ'लों को फ़रोज़ाँ किए हुए तय इल्तिजा की राह किए जा रहा हूँ मैं ख़ुद जिस के सामने सिपर-अंदाख़्ता है हुस्न ऐसी भी इक निगाह किए जा रहा हूँ मैं शायद कभी वो भूल के रक्खें इधर क़दम आँखों को फ़र्श-ए-राह किए जा रहा हूँ मैं बढ़ती ही जा रही हैं तिरी कम-निगाहियाँ क्या दिल में तेरे राह किए जा रहा हूँ मैं ज़ुलमात-ए-दैर-ओ-का'बा में कुछ रौशनी सी है शायद कोई गुनाह किए जा रहा हूँ मैं 'मुल्ला' हर एक ताज़ा मुसीबत पे हँस के और कज गोशा-ए-कुलाह किए जा रहा हूँ मैं — Anand Narayan Mulla
निगाह-ओ-दिल का अफ़्साना क़रीब-ए-इख़्तिताम आया हमें अब इस से क्या आई सहर या वक़्त-ए-शाम आया ज़बान-ए-इश्क़ पर इक चीख़ बन कर तेरा नाम आया ख़िरद की मंज़िलें तय हो चुकीं दिल का मक़ाम आया उठाना है जो पत्थर रख के सीने पर वो गाम आया मोहब्बत में तिरी तर्क-ए-मोहब्बत का मक़ाम आया उसे आँसू न कह इक याद-ए-अय्याम-गुज़िश्ता है मिरी उम्र-ए-रवाँ को उम्र-ए-रफ़्ता का सलाम आया ज़रा लौ और दिल की तेज़ कर सीला सा ये शो'ला न रौशन कर सका घर को न महफ़िल ही के काम आया निज़ाम-ए-मय-कदा साक़ी बदलने की ज़रूरत है हज़ारों हैं सफ़ें जिन में न मय आई न जाम आया अभी तक सैद-ए-यज़्दाँ-ओ-सनम औलाद-ए-आदम है बशर इंसाँ नहीं रहता जहाँ ईमाँ का नाम आया बहार आते ही ख़ूँ-रेज़ी हुई वो सेहन-ए-गुलशन में ख़जिल काँटे थे यूँँ फूलों को जोश-ए-इंतिक़ाम आया भुलाए आब्ला-पाओं को बैठे थे चमन वाले गरजती आँधियाँ आईं कि सहरा का सलाम आया सहर की हूर के क्या क्या ने देखे ख़्वाब दुनिया ने मगर ता'बीर जब ढूँडी वही इफ़रीत-ए-शाम आया कभी शायद उसी से रंग-ए-फ़िरदौस-ए-बशर पाए अभी तक तो लहू इंसाँ का शैताँ ही के काम आया मुकम्मल तब्सिरा करता हुआ अय्याम-ए-रफ़्ता पर निगाह-ए-बे-सुख़न में एक अश्क-ए-बे-कलाम आया तवाना को बहाना चाहिए शायद तशद्दुद का फिर इक मजबूर पर शोरीदगी का इत्तिहाम आया न जाने कितनी शमएँ गुल हुईं कितने बुझे तारे तब इक ख़ुर्शेद इतराता हुआ बाला-ए-बाम आया बरहमन आब-ए-गंगा शैख़ कौसर ले उड़ा इस से तिरे होंटों को जब छूता हुआ 'मुल्ला' का जाम आया — Anand Narayan Mulla

Nazm

शहीद-ए-जौर-ए-गुलचीं हैं असीर-ए-ख़स्ता-तन हम हैं हमारा जुर्म इतना है हवा-ख़्वाह-ए-चमन हम हैं सताने को सता ले आज ज़ालिम जितना जी चाहे मगर इतना कहे देते हैं फ़र्दा-ए-वतन हम हैं हमारे ही लहू की बू सबा ले जाएगी कनआँ मिलेगा जिस से यूसुफ़ का पता वो पैरहन हम हैं हमें ये फ़ख़्र हासिल है पयाम-ए-नूर लाए हैं ज़मीं पहले-पहल चूमी है जिस ने वो किरन हम हैं सुला लेगी हमें ख़ाक-ए-वतन आग़ोश में अपनी न फ़िक्र-ए-गोर है हम को न मुहताज-ए-कफ़न हम हैं बना लेंगे तिरे ज़िंदाँ को भी हम ग़ैरत-ए-महफ़िल लिए अपनी निगाहों में जमाल-ए-अंजुमन हम हैं नहीं तेशा तो सर टकरा के जू-ए-शीर लाएँगे बयाबान-ए-जुनूँ में जानशीन-ए-कोहकन हम हैं ज़माना कर रहा है कोशिशें हम को मिटाने की हिला पाता नहीं जिस को वो बुनियाद-ए-कुहन हम हैं न दौलत है न सर्वत है न ओहदा है न ताक़त है मगर कुछ बात है हम में कि जान-ए-अंजुमन हम हैं तिरे ख़ंजर से अपने दिल की ताक़त आज़माना है मोहब्बत एक अपनी है तिरा सारा ज़माना है फ़िदा-ए-मुल्क होना हासिल-ए-क़िस्मत समझते हैं वतन पर जान देने ही को हम जन्नत समझते हैं कुछ ऐसे आ गए हैं तंग हम कुंज-ए-असीरी से कि अब इस से तो बेहतर गोशा-ए-तुर्बत समझते हैं हमारे शौक़ की वारफ़्तगी है दीद के क़ाबिल पहुँचती है अगर ईज़ा उसे राहत समझते हैं निगाह-ए-क़हर की मुश्ताक़ हैं दिल की तमन्नाएँ ख़त-ए-चीन-ए-जबीं ही को ख़त-ए-क़िस्मत समझते हैं वतन का ज़र्रा ज़र्रा हम को अपनी जाँ से प्यारा है न हम मज़हब समझते हैं न हम मिल्लत समझते हैं हयात-ए-आरज़ी सदक़े हयात-ए-जावेदानी पर फ़ना होना ही अब इक ज़ीस्त की सूरत समझते हैं हमें मालूम है अच्छी तरह ताब-ए-जफ़ा तेरी मगर इस से सिवा अपनी हद-ए-उल्फ़त समझते हैं ग़म-ओ-ग़ुस्सा दिखाना इक दलील-ए-ना-तवानी है जो हँस कर चोट खाती है उसे ताक़त समझते हैं ग़ुलामी और आज़ादी बस इतना जानते हैं हम न हम दोज़ख़ समझते हैं न हम जन्नत समझते हैं दिखाना है कि लड़ते हैं जहाँ में बा-वफ़ा क्यूँँकर निकलती है ज़बाँ से ज़ख़्म खा कर मर्हबा क्यूँँकर — Anand Narayan Mulla
मशरिक़ का दिया गुल होता है मग़रिब पे सियाही छाती है हर दिल सन सा हो जाता है हर साँस की लौ थर्राती है उत्तर दक्खिन पूरब पच्छिम हर सम्त से इक चीख़ आती है नौ-ए-इंसाँ काँधों पे लिए गाँधी की अर्थी जाती है आकाश के तारे बुझते हैं धरती से धुआँ सा उठता है दुनिया को ये लगता है जैसे सर से कोई साया उठता है कुछ देर को नब्ज़-ए-आलम भी चलते चलते रुक जाती है हर मुल्क का परचम गिरता है हर क़ौम को हिचकी आती है तहज़ीब जहाँ थर्राती है तारीख़-ए-बशर शरमाती है मौत अपने कटे पर ख़ुद जैसे दिल ही दिल में पछताती है इंसाँ वो उठा जिस का सानी सदियों में भी दुनिया जन न सकी मूरत वो मिटी नक़्क़ाश से भी जोबन के दोबारा बन न सकी देखा नहीं जाता आँखों से ये मंज़र-ए-इबरतनाक-ए-वतन फूलों के लहू के प्यासे हैं अपने ही ख़स-ओ-ख़ाशाक-ए-वतन हाथों से बुझाया ख़ुद अपने वो शोला-ए-रूह पाक-ए-वतन दाग़ उस से सियह-तर कोई नहीं दामन पे तिरे ऐ ख़ाक-ए-वतन पैग़ाम-ए-अजल लाई अपने उस सब से बड़े मोहसिन के लिए ऐ वाए-तुलू-ए-आज़ादी आज़ाद हुए उस दिन के लिए जब नाख़ुन-ए-हिकमत ही टूटे दुश्वार को आसाँ कौन करे जब ख़ुश्क हुआ अब्र-ए-बाराँ ही शाख़ों को गुल-अफ़शाँ कौन करे जब शोला-ए-मीना सर्द हो ख़ुद जामों को फ़रोज़ाँ कौन करे जब सूरज ही गुल हो जाए तारों में चराग़ाँ कौन करे नाशाद वतन अफ़्सोस तिरी क़िस्मत का सितारा टूट गया उँगली को पकड़ कर चलते थे जिस की वही रहबर छूट गया उस हुस्न से कुछ हस्ती में तिरी अज़दाद हुए थे आ के बहम इक ख़्वाब-ओ-हक़ीक़त का संगम मिट्टी पे क़दम नज़रों में इरम इक जिस्म-ए-नहीफ़-ओ-ज़ार मगर इक अज़्म-ए-जवान-ओ-मुस्तहकम चश्म-ए-बीना मा'सूम का दिल ख़ुर्शीद नफ़स ज़ौक़-ए-शबनम वो इज्ज़-ए-ग़ुरूर-ए-सुल्ताँ भी जिस के आगे झुक जाता था वो मोम कि जिस से टकरा कर लोहे को पसीना आता था सीने में जो दे काँटों को भी जा उस गुल की लताफ़त क्या कहिए जो ज़हर पिए अमृत कर के उस लब की हलावत क्या कहिए जिस साँस में दुनिया जाँ पाए उस साँस की निकहत क्या कहिए जिस मौत पे हस्ती नाज़ करे उस मौत की अज़्मत क्या कहिए ये मौत न थी क़ुदरत ने तिरे सर पर रक्खा इक ताज-ए-हयात थी ज़ीस्त तिरी मेराज-ए-वफ़ा और मौत तिरी मेराज-ए-हयात यकसाँ नज़दीक-ओ-दूर पे था बारान-ए-फ़ैज़-ए-आम तिरा हर दश्त-ओ-चमन हर कोह-ओ-दमन में गूँजा है पैग़ाम तिरा हर ख़ुश्क-ओ-तर हस्ती पे रक़म है ख़त्त-ए-जली में नाम तिरा हर ज़र्रे में तेरा मा'बद हर क़तरा तीरथ धाम तिरा उस लुत्फ़-ओ-करम के आईं में मर कर भी न कुछ तरमीम हुई इस मुल्क के कोने कोने में मिट्टी भी तिरी तक़्सीम हुई तारीख़ में क़ौमों की उभरे कैसे कैसे मुम्ताज़ बशर कुछ मुल्क के तख़्त-नशीं कुछ तख़्त-फ़लक के ताज-बसर अपनों के लिए जाम-ओ-सहबा औरों के लिए शमशीर-ओ-तबर नर्द-ओ-इंसाँ टपती ही रही दुनिया की बिसात-ए-ताक़त पर मख़्लूक़ ख़ुदा की बन के सिपर मैदाँ में दिलावर एक तू ही ईमाँ के पयम्बर आए बहुत इंसाँ का पयम्बर एक तू ही बाज़ू-ए-फ़र्दा उड़ उड़ के थके तिरी रिफ़अत तक जा न सके ज़ेहनों की तजल्ली काम आई ख़ाके भी तिरे हाथ आ न सके अलफ़ाज़-ओ-मा'नी ख़त्म हुए उनवाँ भी तिरा अपना न सके नज़रों के कँवल जल जल के बुझे परछाईं भी तेरी पा न सके हर ईल्म-ओ-यकीं से बाला-तर तू है वो सिपेह्र-ए-ताबिंदा सूफ़ी की जहाँ नीची है नज़र शाइ'र का तसव्वुर शर्मिंदा पस्ती-ए-सियासत को तू ने अपने क़ामत से रिफ़अत दी ईमाँ की तंग-ख़याली को इंसाँ के ग़म की वुसअ'त दी हर साँस से दर्स-ए-अमन दिया हर जब्र पे दाद-ए-उल्फ़त दी क़ातिल को भी गर लब हिल न सके आँखों से दुआ-ए-रहमत दी हिंसा को अहिंसा का अपनी पैग़ाम सुनाने आया था नफ़रत की मारी दुनिया में इक प्रेम संदेसा लाया था उस प्रेम संदेसे को तेरे सीनों की अमानत बनना है सीनों से कुदूरत धोने को इक मौज-ए-नदामत बनना है उस मौज को बढ़ते बढ़ते फिर सैलाब-ए-मोहब्बत बनना है उस सैल-ए-रवाँ के धारे को इस मुल्क की क़िस्मत बनना है जब तक न बहेगा ये धारा शादाब न होगा बाग़ तिरा ऐ ख़ाक-ए-वतन दामन से तिरे धुलने का नहीं ये दाग़ तिरा जाते जाते भी तो हम को इक ज़ीस्त का उनवाँ दे के गया बुझती हुई शम-ए-महफ़िल को फिर शो'ला-ए-रक़्साँ दे के गया भटके हुए गाम-ए-इंसाँ को फिर जादा-ए-इंसाँ दे के गया हर साहिल-ए-ज़ुल्मत को अपना मीनार-ए-दरख़्शाँ दे के गया तू चुप है लेकिन सदियों तक गूँजेगी सदा-ए-साज़ तिरी दुनिया को अँधेरी रातों में ढारस देगी आवाज़ तिरी — Anand Narayan Mulla