देखा कुछ आज यूँँ किसी ग़फ़लत-शिआ'र ने
मैं अपनी उम्र-ए-रफ़्ता को दौड़ा पुकारने
हंगामा-ए-शबाब की पोंछो न सर-गुज़श्त
अपने चमन को लूट लिया ख़ुद बहार ने
पैकान-ए-तीर ज़हर में इतने बुझे न थे
कुछ और कर दिया है नज़र को ख़ुमार ने
तम्मत-ब-ख़ैर दिल की शिकायत की दास्ताँ
होंटों को सी दिया निगह-ए-शर्मसार ने
हिम्मत पड़ी न शैख़ से कहने की मोहतसिब
आए हो इक ग़रीब पे ग़ुस्सा उतारने
वो तो कहो कि आई क़फ़स तक भी बू-ए-गुल
वर्ना भुला दिया था हमें तो बहार ने
जो तंग-ए-गुल थे तुर्रा-ए-दस्तार बन गए
जो गुल थे आए तुर्बत-ए-बे-कस सँवारने
आए हो क्या तुम्हीं मुझे आवाज़ दो ज़रा
आँखों का नूर छीन लिया इंतिज़ार ने
आलाम-ए-रोज़गार से 'मुल्ला' को क्या ग़रज़
अपना बना लिया है उसे चश्म-ए-यार ने
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