निगाह-ओ-दिल का अफ़्साना क़रीब-ए-इख़्तिताम आया
हमें अब इस से क्या आई सहर या वक़्त-ए-शाम आया
ज़बान-ए-इश्क़ पर इक चीख़ बन कर तेरा नाम आया
ख़िरद की मंज़िलें तय हो चुकीं दिल का मक़ाम आया
उठाना है जो पत्थर रख के सीने पर वो गाम आया
मोहब्बत में तिरी तर्क-ए-मोहब्बत का मक़ाम आया
उसे आँसू न कह इक याद-ए-अय्याम-गुज़िश्ता है
मिरी उम्र-ए-रवाँ को उम्र-ए-रफ़्ता का सलाम आया
ज़रा लौ और दिल की तेज़ कर सीला सा ये शो'ला
न रौशन कर सका घर को न महफ़िल ही के काम आया
निज़ाम-ए-मय-कदा साक़ी बदलने की ज़रूरत है
हज़ारों हैं सफ़ें जिन में न मय आई न जाम आया
अभी तक सैद-ए-यज़्दाँ-ओ-सनम औलाद-ए-आदम है
बशर इंसाँ नहीं रहता जहाँ ईमाँ का नाम आया
बहार आते ही ख़ूँ-रेज़ी हुई वो सेहन-ए-गुलशन में
ख़जिल काँटे थे यूँँ फूलों को जोश-ए-इंतिक़ाम आया
भुलाए आब्ला-पाओं को बैठे थे चमन वाले
गरजती आँधियाँ आईं कि सहरा का सलाम आया
सहर की हूर के क्या क्या ने देखे ख़्वाब दुनिया ने
मगर ता'बीर जब ढूँडी वही इफ़रीत-ए-शाम आया
कभी शायद उसी से रंग-ए-फ़िरदौस-ए-बशर पाए
अभी तक तो लहू इंसाँ का शैताँ ही के काम आया
मुकम्मल तब्सिरा करता हुआ अय्याम-ए-रफ़्ता पर
निगाह-ए-बे-सुख़न में एक अश्क-ए-बे-कलाम आया
तवाना को बहाना चाहिए शायद तशद्दुद का
फिर इक मजबूर पर शोरीदगी का इत्तिहाम आया
न जाने कितनी शमएँ गुल हुईं कितने बुझे तारे
तब इक ख़ुर्शेद इतराता हुआ बाला-ए-बाम आया
बरहमन आब-ए-गंगा शैख़ कौसर ले उड़ा इस से
तिरे होंटों को जब छूता हुआ 'मुल्ला' का जाम आया
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Anand Narayan Mulla
our suggestion based on Anand Narayan Mulla
As you were reading Mehfil Shayari Shayari