जब अपना दिल ख़ुद ले डूबे औरों पे सहारा कौन करे
कश्ती पे भरोसा जब न रहा तिनकों पे भरोसा कौन करे
छुप के दुनिया से सवाद-ए-दिल-ए-ख़ामोश में आ
आ यहाँ तू मिरी तरसी हुई आग़ोश में आ
और दुनिया में कहीं तेरा ठिकाना ही नहीं
ऐ मिरे दिल की तमन्ना लब-ए-ख़ामोश में आ
मय-ए-रंगीं पस-ए-मीना से इशारे कब तक
एक दिन साग़र-ए-रिंदान-ए-बला-नोश में आ
इश्क़ करता है तो फिर इश्क़ की तौहीन न कर
या तो बेहोश न हो हो तो न फिर होश में आ
तू बदल दे न कहीं जौहर-ए-इंसाँ का भी रंग
ऐ ज़माने के लहू देख न यूँ जोश में आ
देख क्या दाम लगाती है निगाह-ए-'मुल्ला'
कभी ऐ ग़ुंचा-ए-तर दस्त-ए-गुल-अफ़रोश में आ
क्यूँ न हो ज़िक्र मोहब्बत का मरे नाम के साथ
उम्र काटी है इसी दर्द-ए-दिल-आराम के साथ
मुझ को दुनिया से नहीं अपनी तबाही का गिला
मैं ने ख़ुद साज़ किया गर्दिश-ए-अय्याम के साथ
अब वही ज़ीस्त में है ये मिरे दिल का आलम
जैसे कुछ छूटता जाता है हर इक गाम के साथ
तुझ से शिकवा नहीं साक़ी तिरी सहबा ने मगर
दुश्मनी कोई निकाली है मिरे जाम के साथ
जो करे फ़िक्र-ए-रिहाई वही दुश्मन ठहरे
उन्स हो जाए न ताइर को किसी दाम के साथ
ज़ीस्त के दर्द का एहसास कभी मिट न सका
सिन ख़ुशी के भी कटे इक ग़म-ए-बे-नाम के साथ
मन-ए-तक़्सीर कहूँ दावत-ए-तक़्सीर कहूँ
निगह-ए-नर्म भी है गर्मी-ए-इल्ज़ाम के साथ
अपनी इस आज की ताक़त पे न यूँ इतराओ
मेहर उट्ठा था हर इक सुब्ह-ए-शब-अंजाम के साथ
मैं तुझे भूल चुका हूँ मगर अब भी ऐ दोस्त
आती जाती है निगाहों में चमक शाम के साथ
अब भी काफ़ी है ये हर शोर पे छाने के लिए
कोई उल्फ़त की अज़ाँ दे तो तिरे नाम के साथ
आ गया ख़त्म पे सय्याद तिरा दौर-ए-फ़ुसूँ
अब तो दाना भी नहीं है क़फ़स-ओ-दाम के साथ
काख़-ओ-ऐवाँ यही गुज़रे हुए दौरों के न हों
गर्द सी आई है कुछ दामन-ए-अय्याम के साथ
मैं तिरा हो न सका फिर भी मोहब्बत मैं ने
जब भी दुनिया को पुकारा तो तिरे नाम के साथ
ख़ुल्द उजड़ी है तो अब अपने फ़रिश्तों से बसा
हम से क्या हम तो निकाले गए इल्ज़ाम के साथ
हुजरा-ए-ख़ुल्द है हूर-ए-शरर-अंदाम नहीं
साक़िया आतिश-ए-रंगीं भी ज़रा जाम के साथ
ज़िक्र-ए-'मुल्ला' भी अब आता तो है महफ़िल में मगर
फीकी तारीफ़ में लिपटे हुए दुश्नाम के साथ
मेरी कोशिश है कि शे'रों में समो दूँ 'मुल्ला'
सुब्ह का होश भी दीवानगी-ए-शाम के साथ
दो किनारों के हूँ माबैन में इक पल 'मुल्ला'
रखता जाता हूँ सुतूँ एक हर इक गाम के साथ
सर-ए-महशर यही पूछूँगा ख़ुदा से पहले
तू ने रोका भी था बंदे को ख़ता से पहले
अश्क आँखों में हैं होंटों पे बुका से पहले
क़ाफ़िला ग़म का चला बाँग-ए-दरा से पहले
हाँ यही दिल जो किसी का है अब आईना-ए-हुस्न
वरक़-ए-सादा था उल्फ़त की जिला से पहले
इब्तिदा ही से न दे ज़ीस्त मुझे दर्स इस का
और भी बाब तो हैं बाब-ए-रज़ा से पहले
मैं गिरा ख़ाक पे लेकिन कभी तुम ने सोचा
मुझ पे क्या बीत गई लग़्ज़िश-ए-पा से पहले
अश्क आते तो थे लेकिन ये चमक और तड़प
इन में कब थी ग़म-ए-उल्फ़त की जिला से पहले
दर-ए-मय-ख़ाना से आती है सदा-ए-साक़ी
आज सैराब किए जाएँगे प्यासे पहले
राज़-ए-मय-नोशी-ए-'मुल्ला' हुआ इफ़शा वर्ना
समझा जाता था वली लग़्ज़िश-ए-पा से पहले
मिरी बातों पे दुनिया की हँसी कम होती जाती है
मिरी दीवानगी शायद मुसल्लम होती जाती है
तवज्जोह की नज़र मेरी तरफ़ कम होती जाती है
मैं ख़ुश हूँ इश्क़ की बुनियाद मोहकम होती जाती है
ज़रूरत कुछ भी कहने की बहुत कम होती जाती है
मिरी सूरत ही अब शौक़-ए-मुजस्सम होती जाती है
कभी तू ने पुकारा था मुझे कुछ शक सा होता है
मिरे कानों में इक आवाज़ पैहम होती जाती है
मुझे समझाने आए हैं कि मैं रोने से बाज़ आऊँ
मिरे समझाने वालों की नज़र नम होती जाती है
अभी सुन लो तो शायद सुन सको तुम दिल के नग़्मों को
कि अब उस की सदा कुछ ख़ुद-ब-ख़ुद कम होती जाती है
वही दिल है मगर अब वो नहीं अगली सी बेताबी
वही ख़ूँ है मगर रफ़्तार मद्धम होती जाती है
तुझे मज़हब मिटाना ही पड़ेगा रू-ए-हस्ती से
तिरे हाथों बहुत तौहीन-ए-आदम होती जाती है
नशात-ए-ज़ीस्त की ज़ामिन है अब याद-ए-मोहब्बत ही
यही ख़ुद इश्क़ के ज़ख़्मों का मरहम होती जाती है
मोहब्बत ही से खोलो तुम दिल-ए-'मुल्ला' का दरवाज़ा
यही इस के लिए अब इस्म-ए-आज़म होती जाती है
मिरी बात का जो यक़ीं नहीं मुझे आज़मा के भी देख ले
तुझे दिल तो कब का मैं दे चुका उसे ग़म बना के भी देख ले
ये तो ठीक है कि तिरी जफ़ा भी इक अता मिरे वास्ते
मिरी हसरतों की क़सम तुझे कभी मुस्कुरा के भी देख ले
मिरा दिल अलग है बुझा सा कुछ तिरे हुस्न पर भी चमक नहीं
कभी एक मरकज़-ए-ज़ीस्त पर उन्हें साथ ला के भी देख ले
मिरे शौक़ की हैं वही ज़िदें अभी लब पे है वही इल्तिजा
कभी इस जले हुए तूर पर मुझे फिर बुला के भी देख ले
न मिटेगा नक़्श-ए-वफ़ा कभी न मिटेगा हाँ न मिटेगा ये
किसी और की तो मजाल क्या उसे ख़ुद मिटा के भी देख ले
किसी गुल-ए-फ़सुर्दा-ए-बाग़ हूँ मिरे लब हँसी को भुला चुके
तुझे ऐ सबा जो न हो यक़ीं मुझे गुदगुदा के भी देख ले
मिरे दिल में तू ही है जल्वा-गर तिरा आइना हूँ मैं सर-बसर
यूँही दूर ही से नज़र न कर कभी पास आ के भी देख ले
मिरे ज़र्फ़-ए-इश्क़ पे शक न कर मिरे हर्फ़-ए-शौक़ को भूल जा
जो यही हिजाब है दरमियाँ ये हिजाब उठा के भी देख ले
ये जहान है इसे क्या पड़ी है जो ये सुने तिरी दास्ताँ
तुझे फिर भी 'मुल्ला' अगर है ज़िद ग़म-ए-दिल सुना के भी देख ले
ख़मोशी साज़ होती जा रही है
नज़र आवाज़ होती जा रही है
नज़र तेरी जो इक दिल की किरन थी
ज़माना-साज़ होती जा रही है
नहीं आता समझ में शोर-ए-हस्ती
बस इक आवाज़ होती जा रही है
ख़मोशी जो कभी थी पर्दा-ए-ग़म
यही ग़म्माज़ होती जा रही है
बदी के सामने नेकी अभी तक
सिपर-अंदाज़ होती जा रही है
ग़ज़ल 'मुल्ला' तिरे सेहर-ए-बयाँ से
अजब एजाज़ होती जा रही है
मोहब्बत से भी कार-ए-ज़िंदगी आसाँ नहीं होता
बहल जाता है दिल ग़म का मगर दरमाँ नहीं होता
कली दिल की खिले अफ़्सोस ये सामाँ नहीं होता
घटाएँ घिर के आती हैं मगर बाराँ नहीं होता
मोहब्बत के एवज़ में ओ मोहब्बत ढूँडने वाले
ये दुनिया है यहाँ ऐसा अरे नादाँ नहीं होता
दिल-ए-नाकाम इक तू ही नहीं है सिर्फ़ मुश्किल में
उसे इंकार करना भी तो कुछ आसाँ नहीं होता
हँसी में ग़म छुपा लेना ये सब कहने की बातें हैं
जो ग़म दर-अस्ल ग़म होता है वो पिन्हाँ नहीं होता
ज़माने ने ये तख़्ती किश्त-ए-अरमाँ पर लगा दी है
गुल इस क्यारी में आता है मगर ख़ंदाँ नहीं होता
कहीं क्या तुम से हम अपने दिल-ए-मजबूर का आलम
समझ में वज्ह-ए-ग़म आती है और दरमाँ नहीं होता
मआल-ए-इख़्तिलाफ़-ए-बाहमी अफ़्सोस क्या कहिए
हर इक क़तरे में शोरिश है मगर तूफ़ाँ नहीं होता
दयार-ए-इश्क़ है ये ज़र्फ़-ए-दिल की जाँच होती है
यहाँ पोशाक से अंदाज़ा-ए-इंसाँ नहीं होता
ग़ुरूर-ए-हुस्न तेरी बे-नियाज़ी शान-ए-इस्तिग़ना
जभी तक है कि जब तक इश्क़ बे-पायाँ नहीं होता
सदा-ए-बाज़गश्त आती है अय्याम-ए-गुज़िश्ता की
ये दिल वीरान हो जाने पे भी वीराँ नहीं होता
मोहब्बत तो बजा-ए-ख़ुद इक ईमाँ है अरे 'मुल्ला'
मोहब्बत करने वाले का कोई ईमाँ नहीं होता
दुनिया है ये किसी का न इस में क़ुसूर था
दो दोस्तों का मिल के बिछड़ना ज़रूर था
उस के करम पे शक तुझे ज़ाहिद ज़रूर था
वर्ना तिरा क़ुसूर न करना क़ुसूर था
तुम दूर जब तलक थे तो नग़्मा भी था फ़ुग़ाँ
तुम पास आ गए तो अलम भी सुरूर था
उस इक नज़र के बज़्म में क़िस्से बने हज़ार
उतना समझ सका जिसे जितना शुऊर था
इक दर्स थी किसी की ये फ़नकारी-ए-निगाह
कोई न ज़द में था न कोई ज़द से दूर था
बस देखने ही में थीं निगाहें किसी की तल्ख़
शीरीं सा इक पयाम भी बैनस्सुतूर था
पीते तो हम ने शैख़ को देखा नहीं मगर
निकला जो मय-कदे से तो चेहरे पे नूर था
'मुल्ला' का मस्जिदों में तो हम ने सुना न नाम
ज़िक्र उस का मय-कदों में मगर दूर दूर था
मशरिक़ का दिया गुल होता है मग़रिब पे सियाही छाती है
हर दिल सन सा हो जाता है हर साँस की लौ थर्राती है
उत्तर दक्खिन पूरब पच्छिम हर सम्त से इक चीख़ आती है
नौ-ए-इंसाँ काँधों पे लिए गाँधी की अर्थी जाती है
आकाश के तारे बुझते हैं धरती से धुआँ सा उठता है
दुनिया को ये लगता है जैसे सर से कोई साया उठता है
कुछ देर को नब्ज़-ए-आलम भी चलते चलते रुक जाती है
हर मुल्क का परचम गिरता है हर क़ौम को हिचकी आती है
तहज़ीब जहाँ थर्राती है तारीख़-ए-बशर शरमाती है
मौत अपने कटे पर ख़ुद जैसे दिल ही दिल में पछताती है
इंसाँ वो उठा जिस का सानी सदियों में भी दुनिया जन न सकी
मूरत वो मिटी नक़्क़ाश से भी जोबन के दोबारा बन न सकी
देखा नहीं जाता आँखों से ये मंज़र-ए-इबरतनाक-ए-वतन
फूलों के लहू के प्यासे हैं अपने ही ख़स-ओ-ख़ाशाक-ए-वतन
हाथों से बुझाया ख़ुद अपने वो शोला-ए-रूह पाक-ए-वतन
दाग़ उस से सियह-तर कोई नहीं दामन पे तिरे ऐ ख़ाक-ए-वतन
पैग़ाम-ए-अजल लाई अपने उस सब से बड़े मोहसिन के लिए
ऐ वाए-तुलू-ए-आज़ादी आज़ाद हुए उस दिन के लिए
जब नाख़ुन-ए-हिकमत ही टूटे दुश्वार को आसाँ कौन करे
जब ख़ुश्क हुआ अब्र-ए-बाराँ ही शाख़ों को गुल-अफ़शाँ कौन करे
जब शोला-ए-मीना सर्द हो ख़ुद जामों को फ़रोज़ाँ कौन करे
जब सूरज ही गुल हो जाए तारों में चराग़ाँ कौन करे
नाशाद वतन अफ़्सोस तिरी क़िस्मत का सितारा टूट गया
उँगली को पकड़ कर चलते थे जिस की वही रहबर छूट गया
उस हुस्न से कुछ हस्ती में तिरी अज़दाद हुए थे आ के बहम
इक ख़्वाब-ओ-हक़ीक़त का संगम मिट्टी पे क़दम नज़रों में इरम
इक जिस्म-ए-नहीफ़-ओ-ज़ार मगर इक अज़्म-ए-जवान-ओ-मुस्तहकम
चश्म-ए-बीना मा'सूम का दिल ख़ुर्शीद नफ़स ज़ौक़-ए-शबनम
वो इज्ज़-ए-ग़ुरूर-ए-सुल्ताँ भी जिस के आगे झुक जाता था
वो मोम कि जिस से टकरा कर लोहे को पसीना आता था
सीने में जो दे काँटों को भी जा उस गुल की लताफ़त क्या कहिए
जो ज़हर पिए अमृत कर के उस लब की हलावत क्या कहिए
जिस साँस में दुनिया जाँ पाए उस साँस की निकहत क्या कहिए
जिस मौत पे हस्ती नाज़ करे उस मौत की अज़्मत क्या कहिए
ये मौत न थी क़ुदरत ने तिरे सर पर रक्खा इक ताज-ए-हयात
थी ज़ीस्त तिरी मेराज-ए-वफ़ा और मौत तिरी मेराज-ए-हयात
यकसाँ नज़दीक-ओ-दूर पे था बारान-ए-फ़ैज़-ए-आम तिरा
हर दश्त-ओ-चमन हर कोह-ओ-दमन में गूँजा है पैग़ाम तिरा
हर ख़ुश्क-ओ-तर हस्ती पे रक़म है ख़त्त-ए-जली में नाम तिरा
हर ज़र्रे में तेरा मा'बद हर क़तरा तीरथ धाम तिरा
उस लुत्फ़-ओ-करम के आईं में मर कर भी न कुछ तरमीम हुई
इस मुल्क के कोने कोने में मिट्टी भी तिरी तक़्सीम हुई
तारीख़ में क़ौमों की उभरे कैसे कैसे मुम्ताज़ बशर
कुछ मुल्क के तख़्त-नशीं कुछ तख़्त-फ़लक के ताज-बसर
अपनों के लिए जाम-ओ-सहबा औरों के लिए शमशीर-ओ-तबर
नर्द-ओ-इंसाँ टपती ही रही दुनिया की बिसात-ए-ताक़त पर
मख़्लूक़ ख़ुदा की बन के सिपर मैदाँ में दिलावर एक तू ही
ईमाँ के पयम्बर आए बहुत इंसाँ का पयम्बर एक तू ही
बाज़ू-ए-फ़र्दा उड़ उड़ के थके तिरी रिफ़अत तक जा न सके
ज़ेहनों की तजल्ली काम आई ख़ाके भी तिरे हाथ आ न सके
अलफ़ाज़-ओ-मा'नी ख़त्म हुए उनवाँ भी तिरा अपना न सके
नज़रों के कँवल जल जल के बुझे परछाईं भी तेरी पा न सके
हर ईल्म-ओ-यकीं से बाला-तर तू है वो सिपेह्र-ए-ताबिंदा
सूफ़ी की जहाँ नीची है नज़र शाइ'र का तसव्वुर शर्मिंदा
पस्ती-ए-सियासत को तू ने अपने क़ामत से रिफ़अत दी
ईमाँ की तंग-ख़याली को इंसाँ के ग़म की वुसअ'त दी
हर साँस से दर्स-ए-अमन दिया हर जब्र पे दाद-ए-उल्फ़त दी
क़ातिल को भी गर लब हिल न सके आँखों से दुआ-ए-रहमत दी
हिंसा को अहिंसा का अपनी पैग़ाम सुनाने आया था
नफ़रत की मारी दुनिया में इक प्रेम संदेसा लाया था
उस प्रेम संदेसे को तेरे सीनों की अमानत बनना है
सीनों से कुदूरत धोने को इक मौज-ए-नदामत बनना है
उस मौज को बढ़ते बढ़ते फिर सैलाब-ए-मोहब्बत बनना है
उस सैल-ए-रवाँ के धारे को इस मुल्क की क़िस्मत बनना है
जब तक न बहेगा ये धारा शादाब न होगा बाग़ तिरा
ऐ ख़ाक-ए-वतन दामन से तिरे धुलने का नहीं ये दाग़ तिरा
जाते जाते भी तो हम को इक ज़ीस्त का उनवाँ दे के गया
बुझती हुई शम-ए-महफ़िल को फिर शो'ला-ए-रक़्साँ दे के गया
भटके हुए गाम-ए-इंसाँ को फिर जादा-ए-इंसाँ दे के गया
हर साहिल-ए-ज़ुल्मत को अपना मीनार-ए-दरख़्शाँ दे के गया
तू चुप है लेकिन सदियों तक गूँजेगी सदा-ए-साज़ तिरी
दुनिया को अँधेरी रातों में ढारस देगी आवाज़ तिरी