जुनूँ का दौर है किस किस को जाएँ समझाने

उधर भी होश के दुश्मन इधर भी दीवाने

करम करम है तो है फ़ैज़-ए-आम इस का शिआ'र
ये दश्त है वो गुलिस्ताँ सहाब क्या जाने

किसी में दम नहीं अहल-ए-सितम से कुछ भी कहे
सितम-ज़दों को हर इक आ रहा है समझाने

बशर के ज़ौक़-ए-परस्तिश ने ख़ुद किए तख़्लीक़
ख़ुदा-ओ-का'बा कहीं और कहीं सनम-ख़ाने

उलझ के रह गई हुस्न-ए-नक़ाब में जो नज़र
वो हुस्न-ए-जल्वा-ए-ज़ेर-ए-नक़ाब क्या जाने

इस इर्तिक़ा-ए-तमद्दुन को क्या कहूँ 'मुल्ला'
हैं शमएँ शोख़-तर आवारा-तर हैं परवाने

— Anand Narayan Mulla

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