"मैं देखता हूँ"

ख़ुद को खोने का उस की आँखों में डर देखता हूँ
उस के दिल में ख़ुद के लिए मैं एक घर देखता हूँ
कैसे कह दूँ मैं कि लोग यहाँ यादों में मार देते हैं
पर उस की यादों में ख़ुद को मैं अमर देखता हूँ
डूब जाता हूँ अक्सर उस की झील सी आँखों में
निगाहों को जब मैं फ़क़त नज़र भर देखता हूँ
यादों का क़ाफ़िला करता है जब भी मुझे परेशाँ
फ़लक में अपलक नीमशब मैं क़मर देखता हूँ
देता हूँ तवज्जोह सदा सूरत के ऊपर सीरत को
हर चीज़ में सीरत मैं शाम-ओ-सहर देखता हूँ
होते अक्सर ख़िज़ाँ में बेरूखे शजर-ए-निस्बत
ख़िज़ाँ में भी वो लहलहाता है शजर देखता हूँ
सोच नज़रिया बर्ताव दुनिया से ख़ास है उस का
ख़ुद पर उस की सादगी का मैं असर देखता हूँ
सादगी उस की क़ल्ब में कुछ ऐसा घर कर गई
कि ख़्वाबों ख़्यालों में पहर-दर-पहर देखता हूँ
उस की नेकदिली की अब क्या मिसाल दूँ आप को
बाग़ में न उस से हसीन मैं गुल-ए-तर देखता हूँ

— Sandeep dabral 'sendy'

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