सब को माँ सब सेे प्यारी होती है
बाकी तो दुनियादारी होती है
जिस घर में बेटी हँसती रहती है
उस घर की सूरत न्यारी होती है
निर्धन को कोई पूछे तक नइँ, परसठों से सबकी यारी होती है
याँ ग़ैर लगाते है मरहम लेकिन
अपनों से दिल-आज़ारी होती है
काग़ज़ के टुकड़ों में बिक जाती है
भर्ती जो भी सरकारी होती है
अक़्सर मुफ़लिस बस्ती में है मालूम?
रोटी की मारा-मारी होती है
झुकना लाज़िम है उन सब शानो का
जिन पर याँ ज़िम्मेदारी होती है
— Sandeep dabral 'sendy'















