ki adaaon par teri main ek kitaab likhoonga | कि अदाओं पर तेरी मैं एक किताब लिखूँगा

  - Sandeep dabral 'sendy'

कि अदाओं पर तेरी मैं एक किताब लिखूँगा
तेरी इन आँखों को अंगूरी शराब लिखूँगा

रुख़सार, जबीं हर बार नज़र खींचे अपनी ओर
मैं तिल को नुक़्ता बिंदी को महताब लिखूँगा

नागिन सी जुल्फ़ें तेरी लटके उन पर गजरा
मुख को मह-पारा, गेसू को नायाब लिखूँगा

ग़ुस्से में तनकर जब तुम भौहें मटकाती हो
तुम्हारी इस आदत को ख़ुद पे रुआब लिखूँगा

जिसकी ताबीर लबों पे तबस्सुम लेकर आए
जानाँ तुमको हर रोज़ सुहाना ख़्वाब लिखूँगा

कि झलक भर से लोगों की आँखें चौंधिया जाती
मैं इस लिए तुमको हुस्न-ए-'आलम-ताब लिखूँगा

'सैंडी' पढ़ कर ग़ज़लें पाठक तस्वीर बना दे
सफ़्हा-दर-सफ़्हा रंगीनी-ए-शबाब लिखूँगा

  - Sandeep dabral 'sendy'

Lab Shayari

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