Aziz Nabeel

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Aziz Nabeel shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Aziz Nabeel's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
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Sher

न जाने कैसी महरूमी पस-ए-रफ़्तार चलती है हमेशा मेरे आगे आगे इक दीवार चलती है — Aziz Nabeel
चाँद तारे इक दिया और रात का कोमल बदन सुब्ह-दम बिखरे पड़े थे चार सू मेरी तरह — Aziz Nabeel
मैं किसी आँख से छलका हुआ आँसू हूँ 'नबील' मेरी ताईद ही क्या मेरी बग़ावत कैसी — Aziz Nabeel
गुज़र रहा हूँ किसी ख़्वाब के इलाक़े से ज़मीं समेटे हुए आसमाँ उठाए हुए — Aziz Nabeel
किसी से ज़ेहन जो मिलता तो गुफ़्तुगू करते हुजूम-ए-शहर में तन्हा थे हम, भटक रहे थे — Aziz Nabeel
नबील' ऐसा करो तुम भी भूल जाओ उसे वो शख़्स अपनी हर इक बात से मुकर चुका है — Aziz Nabeel
हम क़ाफ़िले से बिछड़े हुए हैं मगर 'नबील' इक रास्ता अलग से निकाले हुए तो हैं — Aziz Nabeel
एक तख़्ती अम्न के पैग़ाम की टांग दीजे ऊंचे मीनारों के बीच — Aziz Nabeel
ये लुत्फ़ मुझ पर किसलिए एहसान का क्या फ़ाइदा अब वक़्त सारा कट चुका, अच्छा-बुरा, थोड़ा-बहुत — Aziz Nabeel
मैं छुप रहा हूँ कि जाने किस दम उतार डाले लिबास मुझ को — Aziz Nabeel
'नबील' इस इश्क़ में तुम जीत भी जाओ तो क्या होगा ये ऐसी जीत है पहलू में जिस के हार चलती है — Aziz Nabeel
मुसाफ़िरों से कहो अपनी प्यास बाँध रखें सफ़र की रूह में सहरा कोई उतर चुका है — Aziz Nabeel
वो एक राज़ जो मुद्दत से राज़ था ही नहीं उस एक राज़ से पर्दा उठा दिया गया है — Aziz Nabeel
सारे सपने बाँध रखे हैं गठरी में ये गठरी भी औरों में बट जाएगी — Aziz Nabeel
तमाम शहर को तारीकियों से शिकवा है मगर चराग़ की बैअत से ख़ौफ़ आता है — Aziz Nabeel
चुपके चुपके वो पढ़ रहा है मुझे धीरे धीरे बदल रहा हूँ मैं — Aziz Nabeel
फिर नए साल की सरहद पे खड़े हैं हम लोग राख हो जाएगा ये साल भी हैरत कैसी — Aziz Nabeel

Ghazal

मिरा सवाल है ऐ क़ातिलान-ए-शब तुम से कि ये ज़मीन मुनव्वर हुई है कब तुम से चराग़ बख़्शे गए शहर-ए-बे-बसारत को ये कार-ए-ख़ैर भी सरज़द हुआ अजब तुम से वो एक इश्क़ जो, अब तक है तिश्ना-ए-तकमील वो एक दाग़ जो रौशन है रोज़-ओ-शब तुम से मिरी नुमूद में वहशत है, मेरी सोच में शोर बहुत अलग है मिरी ज़िंदगी का ढब तुम से मिरे ख़िताब की शिद्दत पे चीख़ने वालो तुम्हारे लहजे में गोया हुआ हूँ अब तुम से शिकस्ता रिश्तों की हाथों में डोर था में हुए मैं पूछता हूँ मिरे दोस्तो सबब तुम से तुम्हारे नाम की तोहमत है मेरे सर पे 'नबील' जुदा है वर्ना मिरा शजरा-ए-नसब तुम से — Aziz Nabeel
आएँगे नज़र सुब्ह के आसार में हम लोग बैठे हैं अभी पर्दा-ए-असरार में हम लोग लाए गए पहले तो सर-ए-दश्त-ए-इजाज़त मारे गए फिर वादी-ए-इंकार में हम लोग इक मंज़र-ए-हैरत में फ़ना हो गईं आँखें आए थे किसी मौसम-ए-दीदार में हम लोग हर रंग हमारा है, हर इक रंग में हम हैं तस्वीर हुए वक़्त की रफ़्तार में हम लोग ये ख़ाक-नशीनी है बहुत, ज़िल्ल-ए-इलाही जचते ही नहीं जुब्बा-ओ-दस्तार में हम लोग अब यूँँ है कि इक शख़्स का मातम है मुसलसल चुनवाए गए हिज्र की दीवार में हम लोग सुनते थे कि बिकते हैं यहाँ ख़्वाब सुनहरे फिरते हैं तिरे शहर के बाज़ार में हम लोग — Aziz Nabeel
सर-ए-सहरा-ए-जाँ हम चाक-दामानी भी करते हैं ज़रूरत आ पड़े तो रेत को पानी भी करते हैं कभी दरिया उठा लाते हैं अपनी टूटी कश्ती में कभी इक क़तरा-ए-शबनम से तुग़्यानी भी करते हैं कभी ऐसा कि आँखों में नहीं रखते हैं कोई ख़्वाब कभी यूँँ है कि ख़्वाबों की फ़रावानी भी करते हैं हमेशा आप का हर हुक्म सर आँखों पे रखते हैं मगर ये याद रखिएगा कि मन-मानी भी करते हैं मियाँ तुम दोस्त बन कर जो हमारे साथ करते हो वही सब कुछ हमारे दुश्मन-ए-जानी भी करते हैं ये क्या क़ातिल हैं, पहले क़त्ल करते हैं मोहब्बत का फिर उस के ब'अद इज़हार-ए-पशेमानी भी करते हैं तुझे तामीर कर लेना तो इक आसान सा फ़न है रिफ़ाक़त के महल! हम तेरी दरबानी भी करते हैं — Aziz Nabeel
ख़याल-ओ-ख़्वाब का सारा धुआँ उतर चुका है यक़ीं के ताक़ में सूरज कोई ठहर चुका है मुझे उठा के समुंदर में फेंकने वालो ये देखो एक जज़ीरा यहाँ उभर चुका है मैं एक नक़्श, जो अब तक न हो सका पूरा वो एक रंग, जो तस्वीर-ए-जाँ में भर चुका है ये कोई और ही है मुझ में जो झलकता है तुम्हें तलाश है जिस की वो कब का मर चुका है तिरे जवाब की उम्मीद जाँ से बाँधे हुए मिरा सवाल हवा में कहीं बिखर चुका है न तार-तार है दामन, न है गरेबाँ चाक अजीब शक्ल जुनूँ इख़्तियार कर चुका है मुसाफ़िरों से कहो अपनी प्यास बाँध रखें सफ़र की रूह में सहरा कोई उतर चुका है वो जब कि तुझ से उमीदें थीं मेरी दुनिया को वो वक़्त बीत चुका है वो ग़म गुज़र चुका है 'नबील' ऐसा करो तुम भी भूल जाओ उसे वो शख़्स अपनी हर इक बात से मुकर चुका है — Aziz Nabeel
ये किस मक़ाम पे लाया गया ख़ुदाया मुझे कि आज रौंद के गुज़रा है मेरा साया मुझे मैं जैसे वक़्त के हाथों में इक ख़ज़ाना था किसी ने खो दिया मुझ को किसी ने पाया मुझे न जाने कौन हूँ किस लम्हा-ए-तलब में हूँ 'नबील' चैन से जीना कभी न आया मुझे मैं एक लम्हा था और नींद के हिसार में था फिर एक रोज़ किसी ख़्वाब ने जगाया मुझे उसी ज़मीं ने सितारा किया है मेरा वजूद समझ रहे हैं ज़मीं वाले क्यूँँ पराया मुझे जहाँ कि सदियों की ख़ामोशियाँ सुलगती हैं किसी ख़याल की वहशत ने गुनगुनाया मुझे इक आरज़ू के तआक़ुब में यूँँ हुआ है 'नबील' हवा ने रेत की पलकों पे ला बिठाया मुझे — Aziz Nabeel
सुब्ह और शाम के सब रंग हटाए हुए हैं अपनी आवाज़ को तस्वीर बनाए हुए हैं अब हमें चाक पे रख या ख़स-ओ-ख़ाशाक समझ कूज़ा-गर हम तिरी आवाज़ पे आए हुए हैं हम नहीं इतने तही-चश्म कि रो भी न सकें चंद आँसू अभी आँखों में बचाए हुए हैं हम ने ख़ुद अपनी अदालत से सज़ा पाई है ज़ख़्म जितने भी हैं अपने ही कमाए हुए हैं ऐ ख़ुदा भेज दे उम्मीद की इक ताज़ा किरन हम सर-ए-दस्त-ए-दुआ हाथ उठाए हुए हैं हर नया लम्हा हमें रौंद के जाता है कि हम अपनी मुट्ठी में गया वक़्त छुपाए हुए हैं एक मुद्दत हुई तुम आए न पैग़ाम कोई फिर भी कुछ यूँँ है कि हम आस लगाए हुए हैं — Aziz Nabeel
हयात-ओ-काएनात पर किताब लिख रहे थे हम जहाँ जहाँ सवाब था अज़ाब लिख रहे थे हम हमारी तिश्नगी का ग़म रक़म था मौज मौज पर समुंदरों के जिस्म पर सराब लिख रहे थे हम सवाल था कि जुस्तुजू अज़ीम है कि आरज़ू सो यूँँ हुआ कि उम्र भर जवाब लिख रहे थे हम सुलगते दश्त, रेत और बबूल थे हर एक सू नगर नगर, गली गली गुलाब लिख रहे थे हम ज़मीन रुक के चल पड़ी, चराग़ बुझ के जल गए कि जब अधूरे ख़्वाबों का हिसाब लिख रहे थे हम मुझे बताना ज़िंदगी वो कौन सी घड़ी थी जब ख़ुद अपने अपने वास्ते अज़ाब लिख रहे थे हम चमक उठा हर एक पल, महक उठे क़लम दवात किसी के नाम दिल का इंतिसाब लिख रहे थे हम — Aziz Nabeel