zameen ki aankh se manzar koi utaarte hain | ज़मीं की आँख से मंज़र कोई उतारते हैं

  - Aziz Nabeel

ज़मीं की आँख से मंज़र कोई उतारते हैं
हवा का अक्स चलो रेत पर उभारते हैं

ख़ुद अपने होने का इंकार कर चुके हैं हम
हमारी ज़िंदगी अब दूसरे गुज़ारते हैं

तुम्हारी जीत का तुम को यक़ीन आ जाए
सो हम तुम्हारे लिए बार बार हारते हैं

तलाश है हमें कुछ गुम-शुदा बहारों की
गुज़र चुके हैं जो मौसम उन्हें पुकारते हैं

चमक रहे हैं मिरे ख़ेमा-ए-सुख़न हर-सू
हरीफ़ देखिए शब-ख़ून कैसे मारते हैं

ये कैसी हैरतें दरपेश हैं अज़ीज़-'नबील'
ज़रा ठहरते हैं आसेब-ए-जाँ उतारते हैं

  - Aziz Nabeel

Nigaah Shayari

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