so dekh kar tere rukhsaar-o-lab yaqeen aaya | सो देख कर तेरे रुख़्सार-ओ-लब यक़ीं आया

  - Ahmad Faraz

सो देख कर तेरे रुख़्सार-ओ-लब यक़ीं आया
कि फूल खिलते हैं गुलज़ार के अलावा भी

  - Ahmad Faraz

Phool Shayari

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    फोन भी आया तो शिकवे के लिए
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    अब तेरे ज़िक्र पे हम बात बदल देते हैं
    कितनी रग़बत थी तेरे नाम से पहले पहले
    Ahmad Faraz
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    ख़ामोश हो क्यूँ दाद-ए-जफ़ा क्यूँ नहीं देते
    बिस्मिल हो तो क़ातिल को दुआ क्यूँ नहीं देते

    वहशत का सबब रौज़न-ए-ज़िंदाँ तो नहीं है
    मेहर ओ मह ओ अंजुम को बुझा क्यूँ नहीं देते

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    ऐ चारागरो दर्द बढ़ा क्यूँ नहीं देते

    मुंसिफ़ हो अगर तुम तो कब इंसाफ़ करोगे
    मुजरिम हैं अगर हम तो सज़ा क्यूँ नहीं देते

    रहज़न हो तो हाज़िर है मता-ए-दिल-ओ-जाँ भी
    रहबर हो तो मंज़िल का पता क्यूँ नहीं देते

    क्या बीत गई अब के 'फ़राज़' अहल-ए-चमन पर
    यारान-ए-क़फ़स मुझ को सदा क्यूँ नहीं देते
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    Ahmad Faraz
    अजब जुनून-ए-मसाफ़त में घर से निकला था
    ख़बर नहीं है कि सूरज किधर से निकला था

    ये कौन फिर से उन्हीं रास्तों में छोड़ गया
    अभी अभी तो अज़ाब-ए-सफ़र से निकला था

    ये तीर दिल में मगर बे-सबब नहीं उतरा
    कोई तो हर्फ़ लब-ए-चारागर से निकला था

    ये अब जो आग बना शहर शहर फैला है
    यही धुआँ मिरे दीवार-ओ-दर से निकला था

    मैं रात टूट के रोया तो चैन से सोया
    कि दिल का ज़हर मिरी चश्म-ए-तर से निकला था

    ये अब जो सर हैं ख़मीदा कुलाह की ख़ातिर
    ये ऐब भी तो हम अहल-ए-हुनर से निकला था

    वो क़ैस अब जिसे मजनूँ पुकारते हैं 'फ़राज़'
    तेरी तरह कोई दीवाना घर से निकला था
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    Ahmad Faraz
    सब ख़्वाहिशें पूरी हों 'फ़राज़' ऐसा नहीं है
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    Ahmad Faraz
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    इतना मानूस न हो ख़ल्वत-ए-ग़म से अपनी
    तू कभी ख़ुद को भी देखेगा तो डर जाएगा

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    मैं नहीं कोई तो साहिल पे उतर जाएगा

    ज़िंदगी तेरी अता है तो ये जाने वाला
    तेरी बख़्शिश तिरी दहलीज़ पे धर जाएगा

    ज़ब्त लाज़िम है मगर दुख है क़यामत का 'फ़राज़'
    ज़ालिम अब के भी न रोएगा तो मर जाएगा
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    Ahmad Faraz

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