mira sawaal hai ai qaatilaan-e-shab tum se | मिरा सवाल है ऐ क़ातिलान-ए-शब तुम से

  - Aziz Nabeel

मिरा सवाल है ऐ क़ातिलान-ए-शब तुम से
कि ये ज़मीन मुनव्वर हुई है कब तुम से

चराग़ बख़्शे गए शहर-ए-बे-बसारत को
ये कार-ए-ख़ैर भी सरज़द हुआ 'अजब तुम से

वो एक 'इश्क़ जो, अब तक है तिश्ना-ए-तकमील
वो एक दाग़ जो रौशन है रोज़-ओ-शब तुम से

मिरी नुमूद में वहशत है, मेरी सोच में शोर
बहुत अलग है मिरी ज़िंदगी का ढब तुम से

मिरे ख़िताब की शिद्दत पे चीख़ने वालो
तुम्हारे लहजे में गोया हुआ हूँ अब तुम से

शिकस्ता रिश्तों की हाथों में डोर था
में हुए
मैं पूछता हूँ मिरे दोस्तो सबब तुम से

तुम्हारे नाम की तोहमत है मेरे सर पे 'नबील'
जुदा है वर्ना मिरा शजरा-ए-नसब तुम से

  - Aziz Nabeel

Ishq Shayari

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