akshar hi zakhm ishq mein pale hain auratein | अक्सर ही ज़ख़्म इश्क़ में पाले हैं औरतें

  - Abhishar Geeta Shukla

अक्सर ही ज़ख़्म इश्क़ में पाले हैं औरतें
पर कितने टूटे मर्द सँभाले हैं औरतें

  - Abhishar Geeta Shukla

Valentine Shayari

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    वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है
    माथे पे उस के चोट का गहरा निशान है

    वो कर रहे हैं इश्क़ पे संजीदा गुफ़्तुगू
    मैं क्या बताऊँ मेरा कहीं और ध्यान है
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    Dushyant Kumar
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    आग थे इब्तिदा-ए-इश्क़ में हम
    अब जो हैं ख़ाक इंतिहा है ये
    Meer Taqi Meer
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    Kumar Kaushal
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    डर है कहीं ये ऐब उसे रुस्वा कर न दे
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    Harsh saxena
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    इश्क़ नाज़ुक-मिज़ाज है बेहद
    अक़्ल का बोझ उठा नहीं सकता
    Akbar Allahabadi
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    और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
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    Faiz Ahmad Faiz
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    दिल चीज़ क्या है दिल से मोहब्बत जताए कौन
    अपना जो ख़ुद न हो उसे अपना बनाए कौन
    Shakeel Badayuni
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    उन आँखों का मुझ से कोई वा'दा तो नहीं है
    थोड़ी सी मोहब्बत है ज़ियादा तो नहीं है
    Firasat rizvi
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    वो जिस घमंड से बिछड़ा गिला तो इस का है
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    Ahmad Faraz
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    मैं चाहता हूँ मेरा इश्क़ जावेदानी हो
    Vipul Kumar
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    उदास लोग इसी बात से हैं ख़ुश कि चलो
    हमारे साथ हुए हादसों की बात हुई
    Abhishar Geeta Shukla
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    ग़ज़ल में जब भी नए ज़ावियों की बात हुई
    तुम्हारे जिस्म पे खिलते तिलों की बात हुई

    पुराने ज़ख़्म उभर आए जिस्म पर मेरे
    इसी बहाने कई दोस्तों की बात हुई

    उदास लोग इसी बात से हैं ख़ुश कि चलो
    हमारे साथ हुए हादसों की बात हुई

    ज़ियादा तो नहीं पर इतना याद है मुझको
    हमारे होंठ मिले धड़कनों की बात हुई

    हमारे सामने ही दूसरे का ज़िक्र हुआ
    दिए के सामने ही आँधियों की बात हुई

    नए से दौर में कुछ और तो नहीं हुआ पर
    सवाल करती हुई लड़कियों की बात हुई
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    Abhishar Geeta Shukla
    सोचा था इश्क़ होगा नहीं इक परी के बाद
    पर प्यास और बढ़ गयी है उस नदी के बाद

    नाकाम हो जो इश्क़ में तो शाइरी करो
    जादूगरी से काम लो चारागरी के बाद

    तब क्या करेगा दोस्त अगर वो नहीं मिली
    जो ज़िन्दगी तू चाहता है ख़ुदकुशी के बाद

    फिर भी यक़ीन कर रहा हूँ उस ख़ुदा पे मैं
    जो बेबसी बना रहा है आदमी के बाद

    कुछ ज़ख़्म मुस्कुराहटों के ऐसे रह गए
    जैसे कि तीरगी के निशाँ चाँदनी के बाद

    ये दिलजलों की फ़ौज मेरे साथ जाएगी
    कुछ भी नहीं बचेगा यहाँ शायरी के बाद

    हम इश्क़ से निकल चुकी अफ़सुर्दगी में हैं
    इक अजनबी के साथ हैं इक अजनबी के बाद
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    Abhishar Geeta Shukla
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    पहले से पैरहन मिरा इतना उदास और
    फिर पैरहन के हुस्न पे दुख का लिबास और

    क्या ख़ुदकुशी सभी को ये आवाज़ देती है
    आ पटरियों के पास आ थोड़ा सा पास और

    दोनों को मत मिलाइये आँखें हो या शराब
    सहरा की प्यास और है दरिया की प्यास और

    आगे भी काट लेंगे तेरे बिन ये ज़िंदगी
    जब इतनी पी चुके हैं तो इक दो गिलास और

    उन आँसुओं ने छोड़ दी होंठों पे कुछ नमी
    यानी शहद से जुड़ गई गुड़ की मिठास और
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    Abhishar Geeta Shukla
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    दुख तो बहुत मिले हैं मोहब्बत नहीं मिली
    यानी कि जिस्म मिल गया औरत नहीं मिली

    मुझको पिता की आँख के आँसू तो मिल गए
    मुझको पिता से ज़ब्त की आदत नहीं मिली

    वो सारे बदनसीब कहीं नौकरी पे हैं
    जिनको भी ख़ुदकुशी की सहूलत नहीं मिली
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    Abhishar Geeta Shukla
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