ye kis maqaam pe laaya gaya khudaaya mujhe | ये किस मक़ाम पे लाया गया ख़ुदाया मुझे

  - Aziz Nabeel

ये किस मक़ाम पे लाया गया ख़ुदाया मुझे
कि आज रौंद के गुज़रा है मेरा साया मुझे

मैं जैसे वक़्त के हाथों में इक ख़ज़ाना था
किसी ने खो दिया मुझ को किसी ने पाया मुझे

न जाने कौन हूँ किस लम्हा-ए-तलब में हूँ
'नबील' चैन से जीना कभी न आया मुझे

मैं एक लम्हा था और नींद के हिसार में था
फिर एक रोज़ किसी ख़्वाब ने जगाया मुझे

उसी ज़मीं ने सितारा किया है मेरा वजूद
समझ रहे हैं ज़मीं वाले क्यूँँ पराया मुझे

जहाँ कि सदियों की ख़ामोशियाँ सुलगती हैं
किसी ख़याल की वहशत ने गुनगुनाया मुझे

इक आरज़ू के तआक़ुब में यूँँ हुआ है 'नबील'
हवा ने रेत की पलकों पे ला बिठाया मुझे

  - Aziz Nabeel

Shama Shayari

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