ये किस मक़ाम पे लाया गया ख़ुदाया मुझे
कि आज रौंद के गुज़रा है मेरा साया मुझे
मैं जैसे वक़्त के हाथों में इक ख़ज़ाना था
किसी ने खो दिया मुझ को किसी ने पाया मुझे
न जाने कौन हूँ किस लम्हा-ए-तलब में हूँ
'नबील' चैन से जीना कभी न आया मुझे
मैं एक लम्हा था और नींद के हिसार में था
फिर एक रोज़ किसी ख़्वाब ने जगाया मुझे
उसी ज़मीं ने सितारा किया है मेरा वजूद
समझ रहे हैं ज़मीं वाले क्यूँँ पराया मुझे
जहाँ कि सदियों की ख़ामोशियाँ सुलगती हैं
किसी ख़याल की वहशत ने गुनगुनाया मुझे
इक आरज़ू के तआक़ुब में यूँँ हुआ है 'नबील'
हवा ने रेत की पलकों पे ला बिठाया मुझे
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