ज़िंदगी को ख़ुद-कुशी का ख़ौफ़ है
मुझ को उस की दोस्ती का ख़ौफ़ है
ज़ंग आख़िर जीत जाएगी वो फिर
तीरगी को रौशनी का ख़ौफ़ है
मात खा कर आया बेटा इश्क़ में
बाप को अब मय-कशी का ख़ौफ़ है
एक चेहरे पर हैं चेहरे अब तमाम
आदमी को आदमी का ख़ौफ़ है
आ न जाए फिर कहीं वो लौट कर
रंज-ओ-ग़म की वापसी का ख़ौफ़ है
आजकल बतियाना ज़्यादा हो रहा
अब के मुझ को ख़ामुशी का ख़ौफ़ है
रुकने पर तो नीर भी सड़ जाता है
मुझ को अब आसूदगी का ख़ौफ़ है
— Sandeep dabral 'sendy'















