मैं जिस के साथ देखता था याँ अपने घर के सपने
पर वो लड़की तो देखा करती थी अफ़सर के सपने
इक रोज़ हिज्र जब अपने शबाब पर था और पूछो मत
मैं देखता रहा फिर याँ केवल नामाबर के सपने
मैं उस के सपने कुछ ऐसे देखा करता था जैसे
कोई देखा करता है याँ अच्छे अवसर के सपने
अब सपने टूटने भी लाज़िम थे इक झटके में सारे
ज़मीन को जो यहाँ दिखा बैठे थे अंबर के सपने
बारिश में अंदर बाहर का मंज़र इक सा होता है
याँ इस लिए तो मैं देखता हूँ चर्ख़एअख़्ज़र के सपने
— Sandeep dabral 'sendy'















