ज़ख़्मी वीरों को याँ घाइल समझा जाता है
सारे सुख़न-वरो को पागल समझा जाता है
वो केवल पायल नइँ हैं बेड़ियाँ भी याँ जिन को
दुनिया की नज़रों में पायल समझा जाता है
इक बूँद ही बहुत होती है प्यासे के ख़ातिर
सहरा में कथरी को जंगल समझा जाता है
है शिक्षा का बहुत ज़रूरी क़िरदार ज़ीस्त में
वर्ना दुख़ान को भी बादल समझा जाता है
सूरत कहाँ यहाँ कान तक न देखे हैं उस के
जिस के कानों का याँ कुंडल समझा जाता है
क़ीमत अगर पता होती तो बहने नइँ देते
पर अश्कों को मामूली जल समझा जाता है
न आज तक आया है न वो कभी याँ आएगा
जिस को सबकी भाषा में कल समझा जाता है















