वो गुज़रा करती है यार यहाँ जिस जिस भी उपवन से
नींद गुलों की टूटा करती है पायल की छन छन से
है मुस्कान निराली उसकी और आँखों का क्या कहना
बस अच्छे अच्छों को कायल कर देती है चितवन से
हैं दर्शन के अभिलाषी उसके बचपन से पचपन तक
धूप उसे झाँका करती है याँ हुजरे में रौज़न से
यार अनोखा जादू है याँ उसकी कोमल बाँहों में
मुरझाए चेहरे खिल जाते हैं बस इक आलिंगन से
यार मुसलसल छूता है जो उसके नाज़ुक हाथों को
मुझको रश्क़ लगा है होने अब उसके उस कंगन से
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