महताब एक दिन लब-ए-बाम आ के रुक गया
और इंतिज़ार दीद का शाम आ के रुक गया
क्या नाम दूँ उसे जो था दोनों के दरमियाँ
क्या सिलसिला था जो सर-ए-आम आ के रुक गया
करने को काम जितने थे सारे किए मगर
करना था जिसको पूरा वो काम आ के रुक गया
पहले तो मुझको दूर से हैरत से देखा और
जानिब वो फिर मेरे बुत-ए-फ़ाम आ के रुक गया
दिल पर लगी जो चोट तो याद आए कुछ अज़ीज़
और मेरे होंठों पर तेरा नाम आ के रुक गया
चखना कभी तुम उनके भी होठों का रस अज़ीज़
लगता है जैसे होठों पे जाम आ के रुक गया
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