Amaan mirza

Top 10 of Amaan mirza

    महताब एक दिन लब-ए-बाम आ के रुक गया
    और इंतिज़ार दीद का शाम आ के रुक गया

    क्या नाम दूँ उसे जो था दोनों के दरमियाँ
    क्या सिलसिला था जो सर-ए-आम आ के रुक गया

    करने को काम जितने थे सारे किए मगर
    करना था जिस को पूरा वो काम आ के रुक गया

    पहले तो मुझ को दूर से हैरत से देखा और
    जानिब वो फिर मेरे बुत-ए-फ़ाम आ के रुक गया

    दिल पर लगी जो चोट तो याद आए कुछ अज़ीज़
    और मेरे होंठों पर तेरा नाम आ के रुक गया

    चखना कभी तुम उन के भी होंठों का रस अज़ीज़
    लगता है जैसे होंठों पे जाम आ के रुक गया
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    मुझ से मेरी जाँ कर रही हो तर्क-ए-त'अल्लुक़
    तुम को कोई और मिल गया या ऊब चुकी हो
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    इतना मत इतरा अपने रख़्त के साथ
    धँस न जाए कहीं तू तख़्त के साथ

    ज़्यादा  की  भूख  मार  डालेगी
    ज़िंदगी जीना सीख लख़्त के साथ

    सब्र का हाथ थाम के चलना
    बाक़ी सब कुछ मिलेगा बख़्त के साथ

    ये रिवायत हदीसों में है लिखी
    नर्मी से पेश आओ सख़्त के साथ

    बाग़ उजड़ने पे बाग़बाँ रोया
    पंछी रोते रहे दरख़्त के साथ
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    ज़िन्दगी मुख़्तसर सी है मिर्ज़ा, मौत तो एक दिन मुअय्यन है
    तौबा तौबा के हाए रे तौबा, और तू कर भी क्या ही सकता है
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    मैं क्या बताऊँ तुम को अपना हाल
    बेहद बुरा गुज़रा पुराना साल

    कहता हूँ अपने तजरिबे से सुन
    कम अक़लों की यारी जी का जंजाल
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    जो हुआ सो हुआ बाक़ी कल सोचेंगे
    मिल कर इस मसले का हल सोचेंगे

    जिस रोज़ मैं दुनिया से चला जाऊँगा
    आप उस के बा'द मुसलसल सोचेंगे
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    शक़्लो सूरत से नहीं दिखती जवानी मेरी
    उम्र पच्चीस में बूढ़ा हो गया है मिर्ज़ा
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    उस के आने से मुकम्मल हुई ख़ुशियां जिस की
    वो भी रोने लगा बेटी को विदाई देकर
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    बिक जाता है फिर ऐसे लोगों का ईमान
    जो घूस भी खाते हैं दसतरख़्वान पर
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