क्या नाम दूँ उसे जो था दोनों के दरमियाँ
क्या सिलसिला था जो सर-ए-आम आ के रुक गया
करने को काम जितने थे सारे किए मगर
करना था जिस को पूरा वो काम आ के रुक गया
पहले तो मुझ को दूर से हैरत से देखा और
जानिब वो फिर मेरे बुत-ए-फ़ाम आ के रुक गया
दिल पर लगी जो चोट तो याद आए कुछ अज़ीज़
और मेरे होंठों पर तेरा नाम आ के रुक गया
चखना कभी तुम उन के भी होंठों का रस अज़ीज़
लगता है जैसे होंठों पे जाम आ के रुक गया
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मुझ से मेरी जाँ कर रही हो तर्क-ए-त'अल्लुक़
तुम को कोई और मिल गया या ऊब चुकी हो
तुम को कोई और मिल गया या ऊब चुकी हो
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मैं क्या बताऊँ तुम को अपना हाल
बेहद बुरा गुज़रा पुराना साल
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जो हुआ सो हुआ बाक़ी कल सोचेंगे
मिल कर इस मसले का हल सोचेंगे
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शक़्लो सूरत से नहीं दिखती जवानी मेरी
उम्र पच्चीस में बूढ़ा हो गया है मिर्ज़ा
उम्र पच्चीस में बूढ़ा हो गया है मिर्ज़ा
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उस के आने से मुकम्मल हुई ख़ुशियां जिस की
वो भी रोने लगा बेटी को विदाई देकर
वो भी रोने लगा बेटी को विदाई देकर
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बिक जाता है फिर ऐसे लोगों का ईमान
जो घूस भी खाते हैं दसतरख़्वान पर
जो घूस भी खाते हैं दसतरख़्वान पर
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