महताब एक दिन लब-ए-बाम आ के रुक गया

और इंतिज़ार दीद का शाम आ के रुक गया

क्या नाम दूँ उसे जो था दोनों के दरमियाँ
क्या सिलसिला था जो सर-ए-आम आ के रुक गया

करने को काम जितने थे सारे किए मगर
करना था जिस को पूरा वो काम आ के रुक गया

पहले तो मुझ को दूर से हैरत से देखा और
जानिब वो फिर मेरे बुत-ए-फ़ाम आ के रुक गया

दिल पर लगी जो चोट तो याद आए कुछ अज़ीज़
और मेरे होंठों पर तेरा नाम आ के रुक गया

चखना कभी तुम उन के भी होंठों का रस अज़ीज़
लगता है जैसे होंठों पे जाम आ के रुक गया

— Amaan mirza

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Maikada Shayari

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