मैं क्या बताऊँ कैसी थी यारों मेरी पसंद

चेहरे से साँवली थी वो और सादगी पसंद

उस का न हो सका मैं वो मेरा न हो सका
ये और बात मिलती थी हम दोनों की पसंद

हम दोनों में बस एक यही बात थी अलग
मुझ को था इश्क़ और उसे दोस्ती पसंद

फिर उस के आगे है महे ताबाँ की क्या बिसात
चेहरे में इतना नूर के आ जाएगी पसंद

होने लगीं थीं मुझ को अँधेरों से वहशतें
जुगनू को देखा तो आ गई रौशनी पसंद

मेरी तो बात क्या मेरी कुछ भी ख़ता नहीं
अच्छा हूँ या बुरा हूँ मैं हूँ तो तेरी पसंद

पहले पहल जो करते थे मिर्ज़ा का बॉयकॉट
करने लगे हैं वो भी मेरी शा'इरी पसंद

— Amaan mirza

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