"Nadeem khan' Kaavish"

"Nadeem khan' Kaavish"

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"Nadeem khan' Kaavish" shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in "Nadeem khan' Kaavish"'s shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

इक रोज़ अपने ख़्वाब में ऊँचाई से गिरकर मरने ही वाला था कि मेरी नींद खुल गई फिर — "Nadeem khan' Kaavish"
हम सेे न पूछो किस क़दर महरूम हैं हम लोग हम हर किसी बारात को मय्यत समझते हैं — "Nadeem khan' Kaavish"
मुसलसल हादसों से आ रहा हूँ किसी मय्यत पे अब हैरत नहीं है — "Nadeem khan' Kaavish"
हुस्न-ए-यूसुफ़ के लिए ख़्वाब-ए-ज़ुलेख़ा की तड़प जो भी देखे तो कहे ख़्वाब-ए-ज़ुलेख़ा ही बना — "Nadeem khan' Kaavish"
हमारे हाथ में कुछ भी नहीं हैं हमारा हाथ है इस काम में भी — "Nadeem khan' Kaavish"
अमीर-ए-शहर की बेटी अगर मुफ़्लिस पे मर जाए समझ लेना मुहब्बत को बहुत तरसी हुई है वो — "Nadeem khan' Kaavish"
उस ने सलीक़े से दुपट्टा ओढ़ा, सुनते ही अज़ान ये देख कर 'काविश' मेरा ईमान ताज़ा हो गया — "Nadeem khan' Kaavish"
मशरूफ़ हो गए थे यूँँ दुनिया की शाम में तुम को भुलाने की ज़रा फ़ुर्सत नहीं मिली — "Nadeem khan' Kaavish"
जिस्म कोने में रखा रह गया था लाश डोली में बिठा दी गई थी — "Nadeem khan' Kaavish"
तेरी आँखों में कामिल डूबकर ही मर गया कोई बताओ इस तरह से भी ख़ुदा के घर गया कोई — "Nadeem khan' Kaavish"
मेरी ख़्वाहिश है, मैं कुछ इस तरह मशहूर हो जाऊँ मुझे जो भी पढ़े वो ख़ुद कुशी से दूर हो जाए — "Nadeem khan' Kaavish"
कई रास्तों की थकन है बदन में मैं मंज़िल पे आ कर भी पछता रहा हूँ — "Nadeem khan' Kaavish"
समझते हैं ये हाल-ए-दिल भले ही कम समझते हैं अभी कुछ दोस्त ऐसे हैं जो मेरा ग़म समझते हैं — "Nadeem khan' Kaavish"

Ghazal

मंज़रकशी में आँख से मंज़र निकल गया इक हादसा जो हाथ से बाहर निकल गया दुनिया से कूदकर मैं तेरे पास आया था अफ़सोस तू भी दुनिया के अंदर निकल गया मुद्दत के बा'द घर की तरफ़ लौटना हुआ देखा तो जाना घर से मेरे घर निकल गया बच्चों को शहर भेजने की बात आई तो माँ के गले से अक़्द का ज़ेवर निकल गया ऐसे भी मेरी जीत हुई हारते हुए वाहिद खड़ा था जंग में लश्कर निकल गया मैं शहर में दो पैसा कमाने को निकला था तब तक वो शख़्स ग़ैर का बनकर निकल गया काग़ज़ पे एक तीर था दिल चीरता हुआ दिल को तसल्ली थी कि ये ख़ंजर निकल गया तहज़ीब थी, अदब भी था उस वक़्त और आज बच्चों के दिल से बाप का भी डर निकल गया — "Nadeem khan' Kaavish"
इरादा ख़ुद-कुशी का था, बहाना क्या बनाते हम अगर मानो कि मर जाते तो किस-किस को रुलाते हम कोई जो पूछता हम सेे मुहब्बत किस को कहते हैं तो बेहद ही मुहब्बत से, मुहब्बत भी सिखाते हम निकलता दायरे से, सोच तू हिम्मत अगर करता तो तेरा हाथ लेने यार तेरे घर भी आते हम यहाँ तो हर कोई खोया हुआ हैं प्यार में यारों बताओ किस को अपनी ग़म-ज़दा ग़ज़लें सुनाते हम किसी से हारना मुझ को गंवारा ही नहीं लेकिन तू चलता चाल उल्फ़त में तो ख़ुद ही हार जाते हम तुम्हारे जाने का ये ग़म निकलता ही नहीं दिल से ज़रा सोचो तो फिर कैसे किसी से दिल लगाते हम — "Nadeem khan' Kaavish"
ज़माना भी बुलंदी पर मुझे अपना बताता है मगर अफ़सोस गर्दिश में मुझे आँखें दिखाता है वो जिस को मेरी हर इक बात पहले ज़हर लगती थी वो अपने बच्चों को मेरी ही अब ग़ज़लें सुनाता है परिंदे डर गए हैं, मर गए हैं ख़ौफ़ से तेरे कि तेरा नाम सुनते ही कबूतर फड़फड़ाता है तेरी यादों का ये सैलाब दिल से क्यूँ नहीं जाता मुझे रह-रह के तेरे खूनी आँसू में डुबाता है मुझे रोने नहीं देती ये ज़िम्मेदारियाँ घर की अकेला होता हूँ तो दिल बहुत ही टूट जाता हैं दुआएँ साथ चलती हैं मेरे माँ-बाप की यारों कोई भी हादसा हो, मेरे आगे सर झुकाता हैं — "Nadeem khan' Kaavish"
वो अपनी बात को बेहद ही अब उम्दा समझती है सियासत है कि अब ख़ुद को ही जाने क्या समझती है मेरी लाशों के बिखरे ख़्वाब हँसकर ये बताते हैं ग़रीबी हर तरह के झूले को पॅंखा समझती है कभी अपनी ही ख़ुद्दारी ने मुँह के बल गिराया है ये दुनिया दिल नहीं ऐ दोस्त, बस पैसा समझती है बताओ इस सेे प्यारा और कोई भी ख़ुदा है क्या मेरी माँ हर किसी के बच्चे को बेटा समझती है ज़माना मार देता है या ख़ुद ही हार जाते हैं मुहब्बत सच्ची हो तो यार बस फंदा समझती है ये दुनिया क्या समझती है, मुझे कोई तो समझाओ वगरना मैं बताता हूँ ये ख़ुद को क्या समझती है — "Nadeem khan' Kaavish"
कोई मंज़र नहीं टिकता मेरी वीरान आँखों में मुझे लगता नहीं बाक़ी हैं अब भी जान आँखों में ज़रा देखो इधर तुम ग़ौर से एहसास होगा ये समुंदर डाल कर रखना नहीं आसान आँखों में मैं जब भी देखता हूँ साथ में तस्वीर पापा की तो बेहद शोर होता है तभी सुनसान आँखों में सितारा छीन कर मुझ सेे ख़ुदा भी ख़ुश हुआ होगा ख़ुदा तू बोल आया था कोई शैतान आँखों में मेरे वालिद की मय्यत देख कर दिल ने कहा मुझ सेे खड़ा क्या है लुटा दे जान इन बे-जान आँखों में चले जाना मुझे मंज़ूर तो होगा नहीं लेकिन चलो जाओ बढ़ाओ तुम ख़ुदा की शान आँखों में मैं जब वालिद से मिलता हूँ कभी जो क़ब्र पर उन की तो मेरे साथ में रोता है क़ब्रिस्तान आँखों में — "Nadeem khan' Kaavish"

Nazm

"तेरी आँखें" यार तेरी आँखों की तस्वीर बनाना मुश्किल है और फिर उस पर कोई ग़ज़ल सुनाना मुश्किल है कोई कहता है शराब सी नशीली है तेरी आँखें कोई कहता है साफ पानी सी नीली हैं तेरी आँखें अरे मुझ सेे पूछो उस की आँखों में कितनी गहराई हैं जैसे कोई सुरंग है जैसे कोई खाई है अगर देखी होती तेरी आँखें तो इतने मक़बूल नहीं होते न्यूटन के ये सारे लॉ ये कोई रूल नहीं होते किरचौफ के वो रूल वो थ्योरी ये बताती है कैसे सारी आँखें तेरी आँखों पर रुक जाती हैं आर्यभट्ट ने जब बताया था ये पृथ्वी गोल है इस बात में तेरी आँखों का बेहतरीन रोल हैं रदरफोर्ड का परमाणु मॉडल इस बात को दर्शाता है तेरी आँखों में हैं धन आवेश जिस में ये ऋणावेश जाता है एक बात बताओ ये पीरियोडिक टेबल क्यूँ पढ़ते हो यारों उस की आँखें ही रंगीन हैं और उस में साल्ट हैं हजारों ख़ुदा तेरी आँखें अगर बहुत पहले ही बना देता तो रामानुजन सारे फॉर्मूले तेरी आँखों में ही बता देता तेरी आँखों में ही खोये रहते ये दुनिया ईजाद करने वाले ख़ामोश देखते ही रहते ये नेता बात करने वाले इस के आगे कैसे लिखूँ वो सामने आ बैठी है मैं भूल गया ये इंदौर है या लखनऊ है या अमेठी है हाँ याद आया तेरी आँखों की तस्वीर बनाना मुश्किल है और फिर उस पर कोई ग़ज़ल सुनाना मुश्किल है — "Nadeem khan' Kaavish"
"मेरी दास्ताँ" वो दिन भी कितने अजीब थे जब हम दोनों क़रीब थे शबब-ए-हिज़्र न तू, न मैं सब अपने-अपने नसीब थे तू ही मेरी दुनिया थी मैं ही तेरा जहान था मुझे तेरे होने का ग़ुरूर था तुझे मेरे होने पर गुमान था तेरे साथ बिताए थे वो दिन वो राते कितनी हसीन थी उस कमरे में थी जन्नत सारी एक बिस्तर पर ही जमीन थी तेरी गोद में सर रख कर मैं गज़ले अपनी सुनाता था तू सुन कर शा'इरी सो जाती थी, मैं तेरी ख़ुशबू में खो जाता था मेरी कामयाबी की ख़बरें सुन मुझ सेे ज़्यादा झूमा करती थी वो बेवजह बातों-बातों में मेरा माथा चूमा करती थी मेरी हर परेशानी में वो मेरी हमदर्द थी,हम सेाया थी उस से बढ़कर कुछ न था बस वही एक सर्माया थी मुलाक़ात न हो तो कहती थी मैं कैसे आज सो पाऊंगी मुझे गले लगा कर कहती थी मैं तुम सेे जुदा ना हो पाऊंगी इक आईना थी वो मेरा उस सेे कुछ भी नहीं छुपा था हर चीज जानती थी मेरी मेरा सब कुछ उसे पता था यार वही चेहरे हैं अपने वही एहसास दिल में है फिर क्यूँ दूरियाँ बढ़ सी गई क्यूँ रिश्ते आज मुश्किल में है कई सवाल हैं दिल में एक-एक कर के सब सुनोगी क्या? मैं शुरू करता हूँ शुरू से अब सबका जवाब दोगी क्या क्यूँ लौटा दी अंगुठी मुझे? क्यूँ बदल गए सब इरादे तेरे? क्या हुआ तेरी सब क़समों का? अब कहाँ गए सब वादे तेरे? तेरे इन मेहंदी वाले हाथों में किसी ओर का अब नाम हैं इक हादसा हैं मेरे लिए ये माना तेरे लिए ईनाम हैं अपने हिज्र की वो पहली रात तब ख़याल तो मेरा आया होगा आई होगी सब यादें पुरानी मेरी बातों ने भी रुलाया होगा जैसे मुझ में कोई चीख रहा हैं मेरी रूह-रूह तक सो रही हैं मैं अपनी दास्तां लिख रहा हूँ और मेरी शा'इरी रो रही हैं बस यही इल्तिजा हैं ख़ुदा से कोई इतना भी प्यारा न बने कई सूरतें हो सामने नज़र के पर कोई हमारा ना बने — "Nadeem khan' Kaavish"
"ज़िन्दगी की हक़ीक़त" तमाम उम्र चलता रहा, ये सिलसिला जीने के लिए। मौत की दहलीज़ पर आ कर जाना, ज़िन्दगी को कैसे जिए आए मौत की कगार पर, तो दुआएँ तमाम रात की। ज़िन्दगी जीने के सिलसिले में, मौत से मुलाक़ात की बचपन से रुख़सत होते ही, ज़िम्मेदारियों से घिर गए हम चाँद पाने की ख़्वाहिश में, अपने ही क़दमों में गिर गए हम ख़ुद की महफ़िल सूना छोड़कर, सब महफ़िलें आबाद की। ज़िन्दगी जीने के सिलसिले में, मौत से मुलाक़ात की तुम को क्या लगता हैं, ये ज़िन्दगी बहुत आसान हैं? अगर तुम बे-ईमान हो, तो फिर ये भी बहुत बे-ईमान हैं इक तेरे ही सिलसिले में तो, मैं ने तुझ सेे बात की। ज़िन्दगी जीने के सिलसिले में, मौत से मुलाक़ात की यहाँ चाँद की नींद अधूरी है, सूरज को पसीना भरपूर है। जो किसी काम के नहीं हैं, ऐसे सितारों को भी ग़ुरूर हैं इक आसमाँ छूने की ख़ातिर, सब ख़्वाहिशें बर्बाद की ज़िन्दगी जीने के सिलसिले में, मौत से मुलाक़ात की — "Nadeem khan' Kaavish"