
जिसे इज़्ज़त नहीं दिल की उसे यक़सर ज़ुदा कर दो
किसी को फूल देना है तो फिर उस को दिखा कर दो
परिंदे मर रहे हैं क़ैद में तुम को ख़बर है क्या
ज़रा उन पर तरस खाओ मेरी मानो रिहा कर दो
— "Nadeem khan' Kaavish"
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