Bahadur Shah Zafar

Bahadur Shah Zafar

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Delhi· India

Bahadur Shah Zafar shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Bahadur Shah Zafar's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

दिल मेरा बैठा है ले कर फिर मुझी से वो निगार पूछता है हाथ में मेरे बता क्या चीज़ है — Bahadur Shah Zafar
तुम ने किया न याद कभी भूल कर हमें हम ने तुम्हारी याद में सब कुछ भुला दिया — Bahadur Shah Zafar
बे-ख़ुदी में ले लिया बोसा ख़ता कीजे मुआ'फ़ ये दिल-ए-बेताब की सारी ख़ता थी मैं न था — Bahadur Shah Zafar
बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी — Bahadur Shah Zafar
न थी हाल की जब हमें अपने ख़बर रहे देखते औरों के ऐब-ओ-हुनर पड़ी अपनी बुराइयों पर जो नज़र तो निगाह में कोई बुरा न रहा — Bahadur Shah Zafar
क्या ताब क्या मजाल हमारी कि बोसा लें लब को तुम्हारे लब से मिला कर कहे बग़ैर — Bahadur Shah Zafar
मेहनत से है अज़्मत कि ज़माने में नगीं को बे-काविश-ए-सीना न कभी नामवरी दी — Bahadur Shah Zafar

Ghazal

शाने की हर ज़बाँ से सुने कोई लाफ़-ए-ज़ुल्फ़ चीरे है सीना रात को ये मू-शिगाफ़-ए-ज़ुल्फ़ जिस तरह से कि काबे पे है पोशिश-ए-सियाह इस तरह इस सनम के है रुख़ पर ग़िलाफ़-ए-ज़ुल्फ़ बरहम है इस क़दर जो मिरे दिल से ज़ुल्फ़-ए-यार शामत-ज़दा ने क्या किया ऐसा ख़िलाफ़-ए-ज़ुल्फ़ मतलब न कुफ़्र ओ दीं से न दैर ओ हरम से काम करता है दिल तवाफ़-ए-इज़ार ओ तवाफ़-ए-ज़ु़ल्फ़ नाफ़-ए-ग़ज़ाल-ए-चीं है कि है नाफ़ा-ए-ततार क्यूँँकर कहूँ कि है गिरह-ए-ज़ुल्फ़ नाफ़-ए-ज़ुल्फ़ आपस में आज दस्त-ओ-गरेबाँ है रोज़ ओ शब ऐ मेहर-वश ज़री का नहीं मू-ए-बाफ़-ए-ज़ुल्फ़ कहता है कोई जीम कोई लाम ज़ुल्फ़ को कहता हूँ मैं 'ज़फ़र' कि मुसत्तह है काफ़-ए-ज़ुल्फ़ — Bahadur Shah Zafar
सब रंग में उस गुल की मिरे शान है मौजूद ग़ाफ़िल तू ज़रा देख वो हर आन है मौजूद हर तार का दामन के मिरे कर के तबर्रुक सर-बस्ता हर इक ख़ार-ए-बयाबान है मौजूद उर्यानी-ए-तन है ये ब-अज़-ख़िलअत-ए-शाही हम को ये तिरे इश्क़ में सामान है मौजूद किस तरह लगावे कोई दामाँ को तिरे हाथ होने को तू अब दस्त-ओ-गरेबान है मौजूद लेता ही रहा रात तिरे रुख़ की बलाएँ तू पूछ ले ये ज़ुल्फ़-ए-परेशान है मौजूद तुम चश्म-ए-हक़ीक़त से अगर आप को देखो आईना-ए-हक़ में दिल-ए-इंसान है मौजूद कहता है 'ज़फ़र' हैं ये सुख़न आगे सभों के जो कोई यहाँ साहिब-ए-इरफ़ान है मौजूद — Bahadur Shah Zafar
मर गए ऐ वाह उन की नाज़-बरदारी में हम दिल के हाथों से पड़े कैसी गिरफ़्तारी में हम सब पे रौशन है हमारी सोज़िश-ए-दिल बज़्म में शम्अ' साँ जलते हैं अपनी गर्म-बाज़ारी में हम याद में है तेरे दम की आमद-ओ-शुद पुर-ख़याल बे-ख़बर सब से हैं इस दम की ख़बरदारी में हम जब हँसाया गर्दिश-ए-गर्दूं ने हम को शक्ल-ए-गुल मिस्ल-ए-शबनम हैं हमेशा गिर्या ओ ज़ारी में हम चश्म ओ दिल बीना है अपने रोज़ ओ शब ऐ मर्दुमाँ गरचे सोते हैं ब-ज़ाहिर पर हैं बेदारी में हम दोश पर रख़्त-ए-सफ़र बाँधे है क्या ग़ुंचा सबा देखते हैं सब को याँ जैसे कि तय्यारी में हम कब तलक बे-दीद से या रब रखें चश्म-ए-वफ़ा लग रहे हैं आज कल तो दिल की ग़म-ख़्वारी में हम देख कर आईना क्या कहता है यारो अब वो शोख़ माह से सद चंद बेहतर हैं अदा-दारी में हम ऐ 'ज़फ़र' लिख तू ग़ज़ल बहर ओ क़वाफ़ी फेर कर ख़ामा-ए-दुर-रेज़ से हैं अब गुहर-बारी में हम — Bahadur Shah Zafar
रुख़ जो ज़ेर-ए-सुंबल-ए-पुर-पेच-ओ-ताब आ जाएगा फिर के बुर्ज-ए-सुंबले में आफ़्ताब आ जाएगा तेरा एहसाँ होगा क़ासिद गर शिताब आ जाएगा सब्र मुझ को देख कर ख़त का जवाब आ जाएगा हो न बेताब इतना गर उस का इताब आ जाएगा तू ग़ज़ब में ऐ दिल-ए-ख़ाना-ख़राब आ जाएगा इस क़दर रोना नहीं बेहतर बस अब अश्कों को रोक वर्ना तूफ़ाँ देख ऐ चश्म-ए-पुर-आब आ जाएगा पेश होवेगा अगर तेरे गुनाहों का हिसाब तंग ज़ालिम अरसा-ए-रोज़-ए-हिसाब आ जाएगा देख कर दस्त-ए-सितम में तेरी तेग़-ए-आबदार मेरे हर ज़ख़्म-ए-जिगर के मुँह में आब आ जाएगा अपनी चश्म-ए-मस्त की गर्दिश न ऐ साक़ी दिखा देख चक्कर में अभी जाम-ए-शराब आ जाएगा ख़ूब होगा हाँ जो सीने से निकल जाएगा तू चैन मुझ को ऐ दिल-ए-पुर-इज़्तिराब आ जाएगा ऐ 'ज़फ़र' उठ जाएगा जब पर्दा-ए-शर्म-ओ-हिजाब सामने वो यार मेरे बे-हिजाब आ जाएगा — Bahadur Shah Zafar
वाँ इरादा आज उस क़ातिल के दिल में और है और यहाँ कुछ आरज़ू बिस्मिल के दिल में और है वस्ल की ठहरावे ज़ालिम तो किसी सूरत से आज वर्ना ठहरी कुछ तिरे माइल के दिल में और है है हिलाल ओ बद्र में इक नूर पर जो रौशनी दिल में नाक़िस के है वो कामिल के दिल में और है पहले तो मिलता है दिलदारी से क्या क्या दिलरुबा बाँधता मंसूबे फिर वो मिल के दिल में और है है मुझे बाद-अज़-सवाल-ए-बोसा ख़्वाहिश वस्ल की ये तमन्ना एक इस साइल के दिल में और है गो वो महफ़िल में न बोला पा गए चितवन से हम आज कुछ उस रौनक़-ए-महफ़िल के दिल में और है यूँँ तो है वो ही दिल-ए-आलम के दिल में ऐ 'ज़फ़र' उस का आलम मर्द-ए-साहब दिल के दिल में और है — Bahadur Shah Zafar
पान की सुर्ख़ी नहीं लब पर बुत-ए-ख़ूँ-ख़्वार के लग गया है ख़ून-ए-आशिक़ मुँह को इस तलवार के ख़ाल-ए-आरिज़ देख लो हल्क़े में ज़ुल्फ़-ए-यार के मार-ए-मोहरा गर न देखा हो दहन में मार के अंजुम-ए-ताबाँ फ़लक पर जानती है जिस को ख़ल्क़ कुछ शरारे हैं वो मेरी आह-ए-आतिश-बार के तूबा-ए-जन्नत से उस को काम क्या है हूर-वश जो कि हैं आसूदा साए में तिरी दीवार के पूछते हो हाल क्या मेरा क़िमार-ए-इश्क़ में झाड़ बैठा हाथ मैं नक़्द-ए-दिल-ओ-दीं हार के ये हुई तासीर इश्क़-ए-कोह-कन से संग-ए-आब अश्क जारी अब तलक चश्मों से हैं कोहसार के है वो बे-वहदत कि जो समझे है कुफ़्र ओ दीं में फ़र्क़ रखती है तस्बीह रिश्ता तार से ज़ुन्नार के वादा-ए-दीदार जो ठहरा क़यामत पर तो याँ रोज़ होती है क़यामत शौक़ में दीदार के होशियारी है यही कीजे 'ज़फ़र' इस से हज़र देखिए जिस को नशे में बादा-ए-पिंदार के — Bahadur Shah Zafar
ये क़िस्सा वो नहीं तुम जिस को क़िस्सा-ख़्वाँ से सुनो मिरे फ़साना-ए-ग़म को मिरी ज़बाँ से सुनो सुनाओ दर्द-ए-दिल अपना तो दम-ब-दम फ़रियाद मिसाल-ए-नय मिरी हर एक उस्तुख़्वाँ से सुनो करो हज़ार सितम ले के ज़िक्र क्या यक यार शिकायत अपनी तुम इस अपने नीम-जाँ से सुनो ख़ुदा के वास्ते ऐ हमदमो न बोलो तुम पयाम लाया है क्या नामा-बर वहाँ से सुनो तुम्हारे इश्क़ ने रुस्वा किया जहाँ में हमें हमारा ज़िक्र न तुम क्यूँँकि इक जहाँ से सुनो सुनो तुम अपनी जो तेग़-ए-निगाह के औसाफ़ जो तुम को सुनना हो उस शोख़-ए-दिल-सिताँ से सुनो 'ज़फ़र' वो बोसा तो क्या देगा पर कोई दुश्नाम जो तुम को सुनना हो उस शोख़-ए-दिल-सिताँ से सुनो — Bahadur Shah Zafar
जब कभी दरिया में होते साया-अफ़गन आप हैं फ़िल्स-ए-माही को बताते माह-ए-रौशन आप हैं सीते हैं सोज़न से चाक-ए-सीना क्या ऐ चारासाज़ ख़ार-ए-ग़म सीने में अपने मिस्ल-ए-सोज़न आप हैं प्यार से कर के हमाइल ग़ैर की गर्दन में हाथ मारते तेग़-ए-सितम से मुझ को गर्दन आप हैं खींच कर आँखों में अपनी सुर्मा-ए-दुम्बाला-दार करते पैदासहरस नर्गिस में सोसन आप हैं देख कर सहरा में मुझ को पहले घबराया था क़ैस फिर जो पहचाना तो बोला हज़रत-ए-मन आप हैं जी धड़कता है कहीं तार-ए-रग-ए-गुल चुभ न जाए सज पर फूलों की करते क़स्द-ए-ख़ुफ़तन आप हैं क्या मज़ा है तेग़-ए-क़ातिल में कि अक्सर सैद-ए-इश्क़ आन कर उस पर रगड़ते अपनी गर्दन आप हैं मुझ से तुम क्या पूछते हो कैसे हैं हम क्या कहें जी ही जाने है कि जैसे मुश्फ़िक़-ए-मन आप हैं पुर-ग़ुरूर ओ पुर-तकब्बुर पुर-जफ़ा ओ पुर-सितम पुर-फ़रेब ओ पुर-दग़ा पुर-मक्र ओ पुर-फ़न आप हैं ज़ुल्म-पेशा ज़ु़ल्म-शेवा ज़ु़ल्म-रान ओ ज़ुल्म-दोस्त दुश्मन-ए-दिल दुश्मन-ए-जाँ दुश्मन-ए-तन आप हैं यक्का-ताज़ ओ नेज़ा-बाज़ ओ अरबदा-जू तुंद-ख़ू तेग़-ज़न दश्ना-गुज़ार ओ नावक-अफ़गन आप हैं तस्मा-कश तराज़ ओ ग़ारत-गर ताराज-साज़ काफ़िर यग़माई ओ क़ज़्ज़ाक़ रहज़न आप हैं फ़ित्ना-जू बेदाद-गर सफ़्फ़ाक ओ अज़्लम कीना-वर गर्म-जंग ओ गर्म-क़त्ल ओ गर्म-कुश्तन आप हैं बद-मिज़ाज ओ बद-दिमाग़ व बद-शिआ'र ओ बद-सुलूक बद-तरीक़ ओ बद-ज़बाँ बद-अहद ओ बद-ज़न आप हैं बे-मुरव्वत बे-वफ़ा ना-मेहरबाँ ना-आश्ना मेरे क़ातिल मेरे हासिद मेरे दुश्मन आप हैं ऐ 'ज़फ़र' क्या पा-ए-क़ातिल के है बोसे की हवस यूँँ जो बिस्मिल हो के सरगर्म-ए-तपीदन आप हैं — Bahadur Shah Zafar
पान खा कर सुर्मा की तहरीर फिर खींची तो क्या जब मिरा ख़ूँ हो चुका शमशीर फिर खींची तो क्या ऐ मुहव्विस जब कि ज़र तेरे नसीबों में नहीं तू ने मेहनत भी पय-ए-इक्सीर फिर खींची तो क्या गर खिंचे सीने से नावक रूह तू क़ालिब से खींच ऐ अजल जब खिंच गया वो तीर फिर खींची तो क्या खींचता था पाँव मेरा पहले ही ज़ंजीर से ऐ जुनूँ तू ने मिरी ज़ंजीर फिर खींची तो क्या दार ही पर उस ने खींचा जब सर-ए-बाज़ार-इश्क़ लाश भी मेरी पय-ए-तशहीर फिर खींची तो क्या खींच अब नाला कोई ऐसा कि हो उस को असर तू ने ऐ दिल आह-ए-पुर-तासीर फिर खींची तो क्या चाहिए उस का तसव्वुर ही से नक़्शा खींचना देख कर तस्वीर को तस्वीर फिर खींची तो क्या खींच ले अव्वल ही से दिल की इनान-ए-इख़्तियार तू ने गर ऐ आशिक़-ए-दिल-गीर फिर खींची तो क्या क्या हुआ आगे उठाए गर 'ज़फ़र' अहसान-ए-अक़्ल और अगर अब मिन्नत-ए-तदबीर फिर खींची तो क्या — Bahadur Shah Zafar
ख़्वाह कर इंसाफ़ ज़ालिम ख़्वाह कर बेदाद तू पर जो फ़रियादी हैं उन की सुन तो ले फ़रियाद तू दम-ब-दम भरते हैं हम तेरी हवा-ख़्वाही का दम कर न बद-ख़ुओं के कहने से हमें बर्बाद तू क्या गुनह क्या जुर्म क्या तक़्सीर मेरी क्या ख़ता बन गया जो इस तरह हक़ में मिरे जल्लाद तू क़ैद से तेरी कहाँ जाएँगे हम बे-बाल-ओ-पर क्यूँँ क़फ़स में तंग करता है हमें सय्याद तू दिल को दिल से राह है तो जिस तरह से हम तुझे याद करते हैं करे यूँँ ही हमें भी याद तू दिल तिरा फ़ौलाद हो तो आप हो आईना-वार साफ़ यक-बारी सुने मेरी अगर रूदाद तू शाद ओ ख़ुर्रम एक आलम को किया उस ने 'ज़फ़र' पर सबब क्या है कि है रंजीदा ओ नाशाद तू — Bahadur Shah Zafar
क्यूँँकि हम दुनिया में आए कुछ सबब खुलता नहीं इक सबब क्या भेद वाँ का सब का सब खुलता नहीं पूछता है हाल भी गर वो तो मारे शर्म के ग़ुंचा-ए-तस्वीर के मानिंद लब खुलता नहीं शाहिद-ए-मक़्सूद तक पहुँचेंगे क्यूँँकर देखिए बंद है बाब-ए-तमन्ना है ग़ज़ब खुलता नहीं बंद है जिस ख़ाना-ए-ज़िंदाँ में दीवाना तेरा उस का दरवाज़ा परी-रू रोज़ ओ शब खुलता नहीं दिल है ये ग़ुंचा नहीं है इस का उक़्दा ऐ सबा खोलने का जब तलक आवे न ढब खुलता नहीं इश्क़ ने जिन को किया ख़ातिर-गिरफ़्ता उन का दिल लाख होवे गरचे सामान-ए-तरब खुलता नहीं किस तरह मालूम होवे उस के दिल का मुद्दआ' मुझ से बातों में 'ज़फ़र' वो ग़ुंचा-लब खुलता नहीं — Bahadur Shah Zafar
न दाइम ग़म है ने इशरत कभी यूँँ है कभी वूँ है तबद्दुल याँ है हर साअ'त कभी यूँँ है कभी वूँ है गरेबाँ-चाक हूँ गाहे उड़ाता ख़ाक हूँ गाहे लिए फिरती मुझे वहशत कभी यूँँ है कभी वूँ है अभी हैं वो मिरे हमदम अभी हो जाएँगे दुश्मन नहीं इक वज़्अ' पर सोहबत कभी यूँँ है कभी वूँ है जो शक्ल-ए-शीशा गिर्यां हूँ तो मिस्ल-ए-जाम ख़ंदाँ हूँ यही है याँ की कैफ़िय्यत कभी यूँँ है कभी वूँ है किसी वक़्त अश्क हैं जारी किसी वक़्त आह और ज़ारी ग़रज़ हाल-ए-ग़म-ए-फ़ुर्क़त कभी यूँँ है कभी वूँ है कोई दिन है बहार-ए-गुल फिर आख़िर है ख़िज़ाँ बिल्कुल चमन है मंज़िल-ए-इबरत कभी यूँँ है कभी वूँ है 'ज़फ़र' इक बात पर दाइम वो होवे किस तरह क़ाएम जो अपनी फेरता निय्यत कभी यूँँ है कभी वूँ है — Bahadur Shah Zafar
क्यूँँकर न ख़ाकसार रहें अहल-ए-कीं से दूर देखो ज़मीं फ़लक से फ़लक है ज़मीं से दूर परवाना वस्ल-ए-शम्अ पे देता है अपनी जाँ क्यूँँकर रहे दिल उस के रुख़-ए-आतिशीं से दूर मज़मून-ए-वस्ल-व-हिज्र जो ना में में है रक़म है हर्फ़ भी कहीं से मिले और कहीं से दूर गो तीर-ए-बे-गुमाँ है मिरे पास पर अभी जाए निकल के सीना-ए-चर्ख़-ए-बरीं से दूर वो कौन है कि जाते नहीं आप जिस के पास लेकिन हमेशा भागते हो तुम हमीं से दूर हैरान हूँ कि उस के मुक़ाबिल हो आईना जो पुर-ग़ुरूर खिंचता है माह-ए-मुबीं से दूर याँ तक अदू का पास है उन को कि बज़्म में वो बैठते भी हैं तो मिरे हम-नशीं से दूर मंज़ूर हो जो दीद तुझे दिल की आँख से पहुँचे तिरी नज़र निगह-ए-दूर-बीं से दूर दुनिया-ए-दूँ की दे न मोहब्बत ख़ुदा 'ज़फ़र' इंसाँ को फेंक दे है ये ईमान ओ दीं से दूर — Bahadur Shah Zafar
करेंगे क़स्द हम जिस दम तुम्हारे घर में आवेंगे जो होगी उम्र भर की राह तो दम भर में आवेंगे अगर हाथों से उस शीरीं-अदा के ज़ब्ह होंगे हम तो शर्बत के से घूँट आब-ए-दम-ए-ख़ंजर में आवेंगे यही गर जोश-ए-गिर्या है तो बह कर साथ अश्कों के हज़ारों पारा-ए-दिल मेरे चश्म-ए-तर में आवेंगे गर इस क़ैद-ए-बला से अब की छूटेंगे तो फिर हरगिज़ न हम दाम-ए-फ़रेब-ए-शोख़-ए-ग़ारत-गर में आवेंगे न जाते गरचे मर जाते जो हम मालूम कर जाते कि इतना तंग जा कर कूचा-ए-दिलबर में आवेंगे गरेबाँ-चाक लाखों हाथ से उस मेहर-ए-तलअत के ब-रंग-ए-सुब्ह-ए-महशर अरसा-ए-महशर में आवेंगे जो सरगरदानी अपनी तेरे दीवाने दिखाएँगे तो फिर क्या क्या बगूले दश्त के चक्कर में आवेंगे 'ज़फ़र' अपना करिश्मा गर दिखाया चश्म-ए-साक़ी ने तमाशे जाम-ए-जम के सब नज़र साग़र में आवेंगे — Bahadur Shah Zafar
क्या कहूँ दिल माइल-ए-ज़ुल्फ़-ए-दोता क्यूँँकर हुआ ये भला चंगा गिरफ़्तार-ए-बला क्यूँँकर हुआ जिन को मेहराब-ब-इबादत हो ख़म-ए-अबरू-ए-यार उन का काबे में कहो सज्दा अदा क्यूँँकर हुआ दीदा-ए-हैराँ हमारा था तुम्हारे ज़ेर-ए-पा हम को हैरत है कि पैदा नक़्श-ए-पा क्यूँँकर हुआ नामा-बर ख़त दे के उस नौ-ख़त को तू ने क्या कहा क्या ख़ता तुझ से हुई और वो ख़फ़ा क्यूँँकर हुआ ख़ाकसारी क्या अजब खोवे अगर दिल का ग़ुबार ख़ाक से देखो कि आईना सफ़ा क्यूँँकर हुआ जिन को यकताई का दा'वा था वो मिस्ल-ए-आईना उन को हैरत है कि पैदा दूसरा क्यूँँकर हुआ तेरे दाँतों के तसव्वुर से न था गर आब-दार जो बहा आँसू वो दुर्र-ए-बे-बहा क्यूँँकर हुआ जो न होना था हुआ हम पर तुम्हारे इश्क़ में तुम ने इतना भी न पूछा क्या हुआ क्यूँँकर हुआ वो तो है ना-आश्ना मशहूर आलम में 'ज़फ़र' पर ख़ुदा जाने वो तुझ से आश्ना क्यूँँकर हुआ — Bahadur Shah Zafar
है दिल को जो याद आई फ़लक-ए-पीर किसी की आँखों के तले फिरती है तस्वीर किसी की गिर्या भी है नाला भी है और आह-ओ-फ़ुग़ाँ भी पर दिल में हुई उस के न तासीर किसी की हाथ आए है क्या ख़ाक तिरे ख़ाक-ए-कफ़-ए-पा जब तक कि न क़िस्मत में हो इक्सीर किसी की यारो वो है बिगड़ा हुआ बातें न बनाओ कुछ पेश नहीं जाने की तक़रीर किसी की नाज़ाँ न हो मुनइ'म कि जहाँ तेरा महल है होवेगी यहाँ पहले भी ता'मीर किसी की मेरी गिरह-ए-दिल न खुली है न खुलेगी जब तक न खुले ज़ुल्फ़-ए-गिरह-गीर किसी की आता भी अगर है तो वो फिर जाए है उल्टा जिस वक़्त उलट जाए है तक़दीर किसी की इस अबरू ओ मिज़्गाँ से 'ज़फ़र' तेज़ ज़ियादा ख़ंजर न किसी का है न शमशीर किसी की जो दिल से उधर जाए नज़र दिल हो गिरफ़्तार मुजरिम हो कोई और हो तक़्सीर किसी की — Bahadur Shah Zafar
न दो दुश्नाम हम को इतनी बद-ख़़ूई से क्या हासिल तुम्हें देना ही होगा बोसा ख़म-रूई से क्या हासिल दिल-आज़ारी ने तेरी कर दिया बिल्कुल मुझे बे-दिल न कर अब मेरी दिल-जूई कि दिल-जूई से क्या हासिल न जब तक चाक हो दिल फाँस कब दिल की निकलती है जहाँ हो काम ख़ंजर का वहाँ सूई से क्या हासिल बुराई या भलाई गो है अपने वास्ते लेकिन किसी को क्यूँँ कहें हम बद कि बद-गूई से क्या हासिल न कर फ़िक्र-ए-ख़िज़ाब ऐ शैख़ तू पीरी में जाने दे जवाँ होना नहीं मुमकिन सियह-रूई से क्या हासिल चढ़ाए आस्तीं ख़ंजर-ब-कफ़ वो यूँँ जो फिरता है उसे क्या जाने है उस अरबदा-जूई से क्या हासिल अबस पम्बा न रख दाग़-ए-दिल-ए-सोज़ाँ पे तू मेरे कि अंगारे पे होगा चारा-गर रूई से क्या हासिल शमीम-ए-ज़ुल्फ़ हो उस की तो हो फ़रहत मिरे दिल को सबा होवेगा मुश्क-चीं की ख़ुशबूई से क्या हासिल न होवे जब तलक इंसाँ को दिल से मेल-ए-यक-जानिब 'ज़फ़र' लोगों के दिखलाने को यकसूई से क्या हासिल — Bahadur Shah Zafar
हवा में फिरते हो क्या हिर्स और हवा के लिए ग़ुरूर छोड़ दो ऐ ग़ाफ़िलो ख़ुदा के लिए गिरा दिया है हमें किस ने चाह-ए-उल्फ़त में हम आप डूबे किसी अपने आश्ना के लिए जहाँ में चाहिए ऐवान ओ क़स्र शाहों को ये एक गुम्बद-ए-गर्दूं है बस गदा के लिए वो आईना है कि जिस को है हाजत-ए-सीमाब इक इज़्तिराब है काफ़ी दिल-ए-सफ़ा के लिए तपिश से दिल का हो क्या जाने सीने में क्या हाल जो तेरे तीर का रौज़न न हो हवा के लिए तबीब-ए-इश्क़ की दुक्काँ में ढूँडते फिरते ये दर्दमंद-ए-मोहब्बत तिरी दवा के लिए जो हाथ आए 'ज़फ़र' ख़ाक-पा-ए-'फ़ख़रूद्दीन' तो मैं रखूँ उसे आँखों के तूतिया के लिए — Bahadur Shah Zafar
न उस का भेद यारी से न अय्यारी से हाथ आया ख़ुदा आगाह है दिल की ख़बरदारी से हाथ आया न हों जिन के ठिकाने होश वो मंज़िल को क्या पहुँचे कि रस्ता हाथ आया जिस की हुश्यारी से हाथ आया हुआ हक़ में हमारे क्यूँँ सितमगर आसमाँ इतना कोई पूछे कि ज़ालिम क्या सितमगारी से हाथ आया अगरचे माल-ए-दुनिया हाथ भी आया हरीसों के तो देखा हम ने किस किस ज़िल्लत-ओ-ख़्वारी से हाथ आया न कर ज़ालिम दिल-आज़ारी जो ये दिल मंज़ूर है लेना किसी का दिल जो हाथ आया तो दिलदारी से हाथ आया अगरचे ख़ाकसारी कीमिया का सहल नुस्ख़ा है व-लेकिन हाथ आया जिस के दुश्वारी से हाथ आया हुई हरगिज़ न तेरे चश्म के बीमार को सेह्हत न जब तक ज़हर तेरे ख़त्त-ए-ज़ंगारी से हाथ आया कोई ये वहशी-ए-रम-दीदा तेरे हाथ आया था पर ऐ सय्याद-वश दिल की गिरफ़्तारी से हाथ आया 'ज़फ़र' जो दो जहाँ में गौहर-ए-मक़्सूद था अपना जनाब-ए-फ़ख़्र-ए-दीं की वो मदद-गारी से हाथ आया — Bahadur Shah Zafar