baat karne mujhe mushkil kabhi aisi to na thi | बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी

  - Bahadur Shah Zafar

बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी

  - Bahadur Shah Zafar

Jashn Shayari

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    रुख़ जो ज़ेर-ए-सुंबल-ए-पुर-पेच-ओ-ताब आ जाएगा
    फिर के बुर्ज-ए-सुंबले में आफ़्ताब आ जाएगा

    तेरा एहसाँ होगा क़ासिद गर शिताब आ जाएगा
    सब्र मुझ को देख कर ख़त का जवाब आ जाएगा

    हो न बेताब इतना गर उस का इताब आ जाएगा
    तू ग़ज़ब में ऐ दिल-ए-ख़ाना-ख़राब आ जाएगा

    इस क़दर रोना नहीं बेहतर बस अब अश्कों को रोक
    वर्ना तूफ़ाँ देख ऐ चश्म-ए-पुर-आब आ जाएगा

    पेश होवेगा अगर तेरे गुनाहों का हिसाब
    तंग ज़ालिम अरसा-ए-रोज़-ए-हिसाब आ जाएगा

    देख कर दस्त-ए-सितम में तेरी तेग़-ए-आबदार
    मेरे हर ज़ख़्म-ए-जिगर के मुँह में आब आ जाएगा

    अपनी चश्म-ए-मस्त की गर्दिश न ऐ साक़ी दिखा
    देख चक्कर में अभी जाम-ए-शराब आ जाएगा

    ख़ूब होगा हाँ जो सीने से निकल जाएगा तू
    चैन मुझ को ऐ दिल-ए-पुर-इज़्तिराब आ जाएगा

    ऐ 'ज़फ़र' उठ जाएगा जब पर्दा-ए-शर्म-ओ-हिजाब
    सामने वो यार मेरे बे-हिजाब आ जाएगा
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    Bahadur Shah Zafar
    क़ारूँ उठा के सर पे सुना गंज ले चला
    दुनिया से क्या बख़ील ब-जुज़ रंज ले चला

    मिन्नत थी बोसा-ए-लब-ए-शीरीं कि दिल मिरा
    मुझ को सू-ए-मज़ार-ए-शकर गंज ले चला

    साक़ी सँभालता है तो जल्दी मुझे संभाल
    वर्ना उड़ा के पाँ नशा-ए-बंज ले चला

    दौड़ा के हाथ छाती पे हम उन की यूँ फिरे
    जैसे कोई चोर आ के हो नारंज ले चला

    चौसर का लुत्फ़ ये है कि जिस वक़्त पो पड़े
    हम बर-चहार बोले तो बर-पंज ले चला

    जिस दम 'ज़फ़र' ने पढ़ के ग़ज़ल हाथ से रखी
    आँखों पे रख हर एक सुख़न-संज ले चला
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    Bahadur Shah Zafar
    न थी हाल की जब हमें अपने ख़बर रहे देखते औरों के ऐब-ओ-हुनर
    पड़ी अपनी बुराइयों पर जो नज़र तो निगाह में कोई बुरा न रहा
    Bahadur Shah Zafar
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    हम ये तो नहीं कहते कि ग़म कह नहीं सकते
    पर जो सबब-ए-ग़म है वो हम कह नहीं सकते

    हम देखते हैं तुम में ख़ुदा जाने बुतो क्या
    इस भेद को अल्लाह की क़सम कह नहीं सकते

    रुस्वा-ए-जहाँ करता है रो रो के हमें तू
    हम तुझे कुछ ऐ दीदा-ए-नम कह नहीं सकते

    क्या पूछता है हम से तू ऐ शोख़ सितमगर
    जो तू ने किए हम पे सितम कह नहीं सकते

    है सब्र जिन्हें तल्ख़-कलामी को तुम्हारी
    शर्बत ही बताते हैं सम कह नहीं सकते

    जब कहते हैं कुछ बात रुकावट की तिरे हम
    रुक जाता है ये सीने में दम कह नहीं सकते

    अल्लाह रे तिरा रो'ब कि अहवाल-ए-दिल अपना
    दे देते हैं हम कर के रक़म कह नहीं सकते

    तूबा-ए-बहिश्ती है तुम्हारा क़द-ए-रा'ना
    हम क्यूँकर कहें सर्व-ए-इरम कह नहीं सकते

    जो हम पे शब-ए-हिज्र में उस माह-ए-लक़ा के
    गुज़रे हैं 'ज़फ़र' रंज ओ अलम कह नहीं सकते
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    Bahadur Shah Zafar
    वो सौ सौ अठखटों से घर से बाहर दो क़दम निकले
    बला से उस की गर उस में किसी मुज़्तर का दम निकले

    कहाँ आँसू के क़तरे ख़ून-ए-दिल से हैं बहम निकले
    ये दिल में जम्अ थे मुद्दत से कुछ पैकान-ए-ग़म निकले

    मिरे मज़मून-ए-सोज़-ए-दिल से ख़त सब जल गया मेरा
    क़लम से हर्फ़ जो निकले शरर ही यक-क़लम निकले

    निकाल ऐ चारागर तू शौक़ से लेकिन सर-ए-पैकाँ
    उधर निकले जिगर से तीर उधर क़ालिब से दम निकले

    तसव्वुर से लब-ए-लालीं के तेरे हम अगर रो दें
    तो जो लख़्त-ए-जिगर आँखों से निकले इक रक़म निकले

    नहीं डरते अगर हों लाख ज़िंदाँ यार ज़िंदाँ से
    जुनून अब तो मिसाल-ए-नाला-ए-ज़ंजीर हम निकले

    जिगर पर दाग़ लब पर दूद-ए-दिल और अश्क दामन में
    तिरी महफ़िल से हम मानिंद-ए-शम्अ सुब्ह-दम निकले

    अगर होता ज़माना गेसु-ए-शब-रंग का तेरे
    मिरी शब-दीज़ सौदा का ज़ियादा-तर क़दम निकले

    कजी जिन की तबीअत में है कब होती वो सीधी है
    कहो शाख़-ए-गुल-ए-तस्वीर से किस तरह ख़म निकले

    शुमार इक शब किया हम ने जो अपने दिल के दाग़ों से
    तो अंजुम चर्ख़-ए-हशतुम के बहुत से उन से कम निकले

    ख़ुदा के वास्ते ज़ाहिद उठा पर्दा न काबे का
    कहीं ऐसा न हो याँ भी वही काफ़िर-सनम निकले

    तमन्ना है ये दिल में जब तलक है दम में दम अपने
    'ज़फ़र' मुँह से हमारे नाम उस का दम-ब-दम निकले
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    Bahadur Shah Zafar

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