tum vo ladki mujhe lagti to nahin | तुम वो लड़की मुझे लगती तो नहीं

  - Shariq Kaifi

तुम वो लड़की मुझे लगती तो नहीं
आम गोपी से जो राधा हो जाए

  - Shariq Kaifi

Aurat Shayari

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    कितनी फ़िल्में देखूँगा मैं उस लड़की की यादों में
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As you were reading Shayari by Shariq Kaifi

    दिलों पर नक़्श होना चाहता हूँ
    मुकम्मल मौत से घबरा रहा हूँ

    सभी से राज़ कह देता हूँ अपने
    न जाने क्या छुपाना चाहता हूँ

    तवज्जोह के लिए तरसा हूँ इतना
    कि इक इल्ज़ाम पर ख़ुश हो रहा हूँ

    मुझे महफ़िल के बाहर का न जानो
    मैं अपना जाम ख़ाली कर चुका हूँ

    ये आदत भी उसी की दी हुई है
    कि सब को मुस्कुरा कर देखता हूँ

    अलग होती है हर लम्हे की दुनिया
    पुराना हो के भी कितना नया हूँ
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    Shariq Kaifi
    सब यार मेरे ख़ूब कमाने में लगे थे
    हम पिछली कमाई को लुटाने में लगे थे

    वो छत भी गई सर से जो दुनिया थी हमारी
    हम कौन सी दुनिया को बचाने में लगे थे

    रोने को जिन्हें आज सजाई है ये महफ़िल
    अच्छे वो किसी और ज़माने में लगे थे

    किस सच का उन्हें सामना करने से था इंकार
    क्यों लोग मिरा झूठ छुपाने में लगे थे

    मा'सूम थे इतने कि जुदा होने के दिन भी
    फूलों से तेरे घर को सजाने में लगे थे

    बैठे थे सभी दिल के दरीचों को किए बंद
    और घर को हवा-दार बनाने में लगे थे

    मैं किस को वहाँ क़ैद की रूदाद सुनाता
    सब अपने गिरफ़्तार गिनाने में लगे थे
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    Shariq Kaifi
    रोज़ का इक मश्ग़ला कुछ देर का
    उस गली का रास्ता कुछ देर का

    बात क्या बढ़ती कि जब मा’लूम था
    साथ है कुछ दूर का कुछ देर का

    उ’म्‍र भर को एक कर जाता हमें
    हौसला तेरा मिरा कुछ देर का

    फिर मुझे दुनिया में शामिल कर गया
    ख़ुद से मेरा वास्ता कुछ देर का

    अब नहीं तो कल ये रिश्ता टूटता
    फ़र्क़ क्या पड़ता भला कुछ देर का
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    होने से मिरे फ़र्क़ ही पड़ता था भला क्या
    मैं आज न जागा तो सवेरा न हुआ क्या

    सब भीगी रुतें नींद के उस पार हैं शायद
    लगती है ज़रा आँख तो आती है हवा क्या

    हम खोज में जिस की हैं परेशान अज़ल से
    बीमार की आँखों ने वो दर ढूँड लिया क्या

    मक़्तूल को बाँहों में लिए बैठा रहूँ क्यूँ
    इस जुर्म से लेना है उसे और मज़ा किया

    दीवार क़फ़स की हो कि घर की मुझे क्या फ़र्क़
    तफ़रीह के सामाँ हों मयस्सर तो सज़ा क्या

    ऐसा तो कभी रक़्स में बे-ख़ुद न हवा मैं
    मय-ख़ाने के माहौल में होता है नशा क्या

    ये धूप की तेज़ी ये सराबों की सजावट
    सहरा ने जुनूँ को मिरे पहचान लिया क्या
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    दिल किसी और की अमानत है
    Shariq Kaifi
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