andar-andar khush hain dono | अंदर-अंदर ख़ुश हैं दोनों

  - Shariq Kaifi

अंदर-अंदर ख़ुश हैं दोनों
पहला-पहला झगड़ा कर के

  - Shariq Kaifi

Khushi Shayari

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    इतने अफ़सुर्दा नहीं हैं हम कि कर लें ख़ुदकुशी
    और न इतने ख़ुश कि सच में मरने की ख़्वाहिश न हो
    Charagh Sharma
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    ख़ुशी की बात और है ग़मों की बात और
    तुम्हारी बात और है हमारी बात और
    Anwar Taban
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    तो यानी उसको अपने घर का रास्ता नहीं पता

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    Ruqayyah Maalik
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    जिस्म ताज़ा है रूह बासी है

    सब हँसी को हँसी समझते हैं
    तुम तो समझो हँसी उदासी है
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    दुखी रहने की आदत यूंँ बना ली है कि अब कोई
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    उदास लोग इसी बात से हैं ख़ुश कि चलो
    हमारे साथ हुए हादसों की बात हुई
    Abhishar Geeta Shukla
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    नाम पे हम क़ुर्बान थे उस के लेकिन फिर ये तौर हुआ
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    उस लड़की ने मुझ से बिछड़ कर मर जाने की ठानी थी
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    Jaun Elia
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    अश्क माँ के जो ख़ुशी से गिरे तो हैं मोती
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    S M Afzal Imam
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    नज़र मिल गई आप जीते मैं हारा
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    Nushur Wahidi
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    शाम से छत पर घुम रहा हूँ
    एक दिए के आगे-पीछे
    Shariq Kaifi
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    वो दिन भी थे कि इन आँखों में इतनी हैरत थी
    तमाम बाज़ीगरों को मिरी ज़रूरत थी

    वो बात सोच के मैं जिस को मुद्दतों जीता
    बिछड़ते वक़्त बताने की क्या ज़रूरत थी

    पता नहीं ये तमन्ना-ए-क़ुर्ब कब जागी
    मुझे तो सिर्फ़ उसे सोचने की आदत थी

    ख़मोशियों ने परेशाँ किया तो होगा मगर
    पुकारने की यही सिर्फ़ एक सूरत थी

    गए भी जान से और कोई मुतमइन न हुआ
    कि फिर दिफ़ाअ न करने की हम पे तोहमत थी

    कहीं पे चूक रहे हैं ये आईने शायद
    नहीं तो अक्स में अब तक मिरी शबाहत थी
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    Shariq Kaifi
    झूट पर उस के भरोसा कर लिया
    धूप इतनी थी कि साया कर लिया

    अब हमारी मुश्किलें कुछ कम हुईं
    दुश्मनों ने एक चेहरा कर लिया

    हाथ क्या आया सजा कर महफ़िलें
    और भी ख़ुद को अकेला कर लिया

    हारने का हौसला तो था नहीं
    जीत में दुश्मन की हिस्सा कर लिया

    मंज़िलों पर हम मिलें ये तय हुआ
    वापसी में साथ पक्का कर लिया

    सारी दुनिया से लड़े जिस के लिए
    एक दिन उस से भी झगड़ा कर लिया

    क़ुर्ब का उस के उठा कर फ़ाएदा
    हिज्र का सामाँ इकट्ठा कर लिया

    गुफ़्तुगू से हल तो कुछ निकला नहीं
    रंजिशों को और ताज़ा कर लिया

    मोल था हर चीज़ का बाज़ार में
    हम ने तन्हाई का सौदा कर लिया
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    Shariq Kaifi
    कोई कुछ भी कहता रहे सब ख़ामोशी से सुन लेता है
    उस ने भी अब गहरी गहरी साँसें लेना सीख लिया है

    पीछे हटना तो चाहा था पर ऐसे भी नहीं चाहा था
    अपनी तरफ़ बढ़ने के लिए भी उस की तरफ़ चलना पड़ता है

    जब तक हो और जैसे भी हो दूर रहो उस की नज़रों से
    इतना पुराना है कि ये रिश्ता फिर से नया भी हो सकता है

    जैसे सब तूफ़ान मिरी साँसों से बंधे हों मुझ में छुपे हों
    दिल में किसी डर के आते ही ज़ोर हवा का बढ़ जाता है

    मैं तो फ़सुर्दा हूँ ही लेकिन अश्क रक़ीब की आँख में भी हैं
    एक महाज़ पे हारे हैं हम ये रिश्ता क्या कम रिश्ता है

    रंग में हैं सारे घर वाले खनक रहे हैं चाय के प्याले
    दुनिया जाग चुकी है लेकिन अपना सवेरा नहीं हुआ है
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    Shariq Kaifi
    काश वो दिन वो ज़माने लौट आएँ
    बिन तुम्हारे भी गुज़ारा था कभी
    Shariq Kaifi
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