intiha tak baat le jaata hooñ main | इंतिहा तक बात ले जाता हूँ मैं

  - Shariq Kaifi

इंतिहा तक बात ले जाता हूँ मैं
अब उसे ऐसे ही समझाता हूँ मैं

कुछ हवा कुछ दिल धड़कने की सदा
शोर में कुछ सुन नहीं पाता हूँ मैं

बिन कहे आऊँगा जब भी आऊँगा
मुंतज़िर आँखों से घबराता हूँ मैं

याद आती है तिरी संजीदगी
और फिर हँसता चला जाता हूँ मैं

फ़ासला रख के भी क्या हासिल हुआ
आज भी उस का ही कहलाता हूँ मैं

छुप रहा हूँ आइने की आँख से
थोड़ा थोड़ा रोज़ धुँदलाता हूँ मैं

अपनी सारी शान खो देता है ज़ख़्म
जब दवा करता नज़र आता हूँ मैं

सच तो ये है मुस्तरद कर के उसे
इक तरह से ख़ुद को झुटलाता हूँ मैं

आज उस पर भी भटकना पड़ गया
रोज़ जिस रस्ते से घर आता हूँ मैं

  - Shariq Kaifi

Ghar Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Shariq Kaifi

As you were reading Shayari by Shariq Kaifi

Similar Writers

our suggestion based on Shariq Kaifi

Similar Moods

As you were reading Ghar Shayari Shayari