kam se kam duniya se itnaa miraa rishta ho jaa.e | कम से कम दुनिया से इतना मिरा रिश्ता हो जाए

  - Shariq Kaifi

कम से कम दुनिया से इतना मिरा रिश्ता हो जाए
कोई मेरा भी बुरा चाहने वाला हो जाए

इसी मजबूरी में ये भीड़ इकट्ठा है यहाँ
जो तिरे साथ नहीं आए वो तन्हा हो जाए

शुक्र उस का अदा करने का ख़याल आए किसे
अब्र जब इतना घना हो कि अँधेरा हो जाए

हाँ नहीं चाहिए उस दर्जा मोहब्बत तेरी
कि मिरा सच भी तिरे झूट का हिस्सा हो जाए

बंद आँखों ने सराबों से बचाया है मुझे
आँख वाला हो तो इस खेल में अंधा हो जाए

मैं भी क़तरा हूँ तिरी बात समझ सकता हूँ
ये कि मिट जाने के डर से कोई दरिया हो जाए

बस इसी बात पे आईनों से बिगड़ी मेरी
चाहता था मिरा अपना कोई चेहरा हो जाए

बज़्म-ए-याराँ में यही रंग तो देते हैं मज़ा
कोई रोए तो हँसी से कोई दोहरा हो जाए

  - Shariq Kaifi

Bahan Shayari

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