उस धोके ने तोड़ दिया है इतना मुझ को
अब कुछ भी समझा लेती है दुनिया मुझ को
यारों ने क्या ख़ूब जुनूँ का तोड़ निकाला
सब ने मिल कर छोड़ दिया समझाना मुझ को
उस ने मुजरिम ठहराया तो मान गया मैं
वैसे कोई याद नहीं था वा'दा मुझ को
औरों की जाँ मैं ख़तरे में डाल न पाया
कश्ती कश्ती ढूँड रहा था दरिया मुझ को
इस सूरत में यार भला क्या कर सकते थे
तोड़ रहा था अन्दर का सन्नाटा मुझ को
मुझ को पढ़ना मुझे समझना क्या लाज़िम है
झूम झूम के बंद करो दोहराना मुझ को
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